परम पूजनीय चमत्कारी संत श्री चन्द्रभान जी महाराज का जीवन चरित्र

भारतवर्ष ने सदा ही विश्व का धार्मिक नेतृत्व किया है। अनेक ऋषि- मुनियों तथा साधु-सन्तों ने अपने आध्यात्मिक ज्ञान से जन साधारण का मार्ग दर्शन किया है। इसी आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर उन्होंने ऐसे दैवी चमत्कार भी दिखाए हैं, जिनको देखकर तथा सुनकर लोग आश्चर्य चकित रह गये हैं। उपनिषद् पुराण तथा धार्मिक पुस्तकें इसके साक्षी हैं। आपने भी दन्तकथाओं में इस विषय पर अनेक तथ्यपूर्ण वास्तविक कहानियां सुनी होंगी इस प्रकार को महान विभूतियाँ केवल सतयुग, त्रेतायुग तथा द्वापर युग में ही नहीं, अपितु कलियुग में भी अवतरित हुई है, जिन सज्जनों की धर्म में आस्था तथा साधु ओ की भक्तों में श्रद्धा है, उनके लिए हम एक ऐसे ही ' सन्त जी' को ' प्रकाशित करवा रहे है, जो जीवन पर्यन्त ईश्वर भक्ति, ब्रह्मचर्य पालन दीन-हीन की सेवा, समाज सुधार, भजन कीर्तन तथा सत्संग के अद्भुत चमत्कारों से लाखों लोगों का उद्धार किया है। प्रसिद्धि रखने वाले सन्त जी अनभिन्न किजे तथा यश और गुणगान से दूर रहने की इच्छा रख क्षपत जीवन परिचय इस प्रकार है-

जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन

हरियाणा प्रान्त के जिला रोहतक में एक गांव है गिरावड़ इसी ग्राम में लाला नैकी राम जैन रहते थे । जो दानशील सदाचारी तथा धर्म कर्म में श्रद्धा रखने वाले थे। उनकी पत्नी श्रीमती बूली देवी धार्मिक विचारों वाली उदार तथा दयालु स्त्री थी । इन्हीं के घर में कातिक सुदी पूर्णमासी विक्रमी सम्बत्‌ 1975 (8 नवम्बर 1918 को) एक पुत्र उत्पन हुआ जो विरासत में ईश्वर- भक्ति, सदाचार तथा दानशीलता अपने साथ लेकर आया। ध्रुव और प्रहलाद की भांति शैशव काल से ही आपका रुझान ईश्वर-भक्ति की ओर था, इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रभु ने जिस पर भी कृपा की उसको अनेक कष्ट देकर उसकी पूर्ण परीक्षा ली है। अग्नि में तप कर ही सोना कुन्दन बनता है तथा उसके रूप में निखार आता है। आप पर भी यह उदाहरण उसी प्रकार लागू हुआ जैसा अन्य भक्तों पर | बाल्यकाल में ही आप पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा, क्योंकि पिता का साया सिर से उठ गया। इस प्रकार भाग्य ने अपना खेल दिखाया जैसे अबोध बालक ने ईश्वर इच्छा समझ कर अपनीं सहनशक्ति का परिचय दिया. पिता विहीन बालक के पालन पोषण का भार अब माता के कन्धों पर था । अत: माता ने बड़े लग्न और आशा से पालपोस कर बच्चे को 12 साल का किया । माता की इच्छा कदाचित सद्गृहस्थ बनाने की थी, परंतु तुलसीदास जी के मतानुसार होई है सोई जो राम रच राखा थी। विधि की विधान कहिये या संयोग कि अपने इस बालक का नाम माता पिता ने चंद्र्भान रखा, जिसे समय आने पर इन्होंने सार्थक करके दिखा दिया। दीन दुखियों और रोग-शोक पीड़ितों के लिए ये चन्द्र के समान शांति और शीतलता प्रदान करने वाले तथा भानु के समान ज्ञान प्रकाश फैलाने वाले बने । बाल्यकाल से ही आप ईश्वर-भक्ति में लीन रहते थे, घर में हर समय चिन्तन, मनन और एकाग्रता की मुद्रा में देखे जाते थे । भक्ति और वैराग्य का जो अंकुर मन में अंकुरित हो चुका था, । आवश्यकता थी एक ऐसे गुरु की जो भक्ति का मार्ग दिखा सके तथा ज्ञान का द्वार खोल सके । सौभाग्य से इन्हें ऐसा गुरु भी मिल गया मार्ग निर्देशन में अभ्यास आरम्भ कर दिया और उसी मार्ग का अनुसरण साधना की चरम सीमा पर पहुँच गए वैराग्य तथा तपस्वी जीवन घटना चिक्रमी संम्ब्तू 1987 के आसपास कै है । उन दिनों ही गाम के निवासी दादा रामकिशन जी की प्रसिद्धि चारों और फैली हुई थी, समस्त परिजनों के समाप्त होने से उन्हें बैराग्य हो गया था | पुत्र के दाह संस्कार के उपरान्त वे घर नहीं लौटे अपितु गांव के बाहर अपने बाड़े में समाधि लगा कर बैठ गए। तीसरे आश्रम में आपने कठोर तप किया प्रभु की अनन्य उपासना को। आपके तप के प्रभाव से श्रद्धालु लोगों तथा सांसारिक सुख की इच्छा रखने बालों की भी कमी नहीं थी । वेद शास्त्रों में भी निष्काम सेवा को सबने बड़ा धर्म बताया गया है। आपकी प्रसिद्धि चारों ओर फैली हुई थी लोग शंका समाधान श्रवण और ज्ञानोपार्जन के निमित आपके पास आने जाने लगे। समय पाकर सन्त जी के अग्रज लाला चन्दूलाल भी उनके पास गए और उन्होंने ' दादा जी ' को बताया मेरा छोटा भाई हर संभव विचार मग्न रह्ता है ' दादा जी ' ने आदेश दिया कि उसे मेरे पास भेज देना । परन्तु बाल सुलभ संकोच के कारण जब भगत जी वहाँ नहीं गये तो स्वय दादा रामकिशन जी उनके घर आये। 12 वर्ष के बाल भगत को लेकर दादा जी अपने आश्रम मे आ गए. उन्होने अपने शिश्य की शिक्षा दीक्षा का प्रबन्ध किया तथा अपने साथ ही भक्ति भावना मे लीन कर लिया। ज्ञान, ध्यान और तप का क्रम ना आश्रम मे ठीक प्रकार से चल्ता रहा | उस समय तक आपको गुरु महीमा का ज्ञान हो गया था। गरु के विषय मैं निम्नलिखित दौहों का आपने सदैव ध्यान रखा । कबीरदास जी के इन दोहों के अनुसार आपने गुरु को गोबिन्द समझ कर उनकी दस साल तक तन-मन से सेवा-सुश्रुषा की । गुरु सेवा से आपको बड़ा आनन्द प्राप्त होता था, परन्तु भाग्य की विडम्बना ने आपको इस सुख से भी वंचित कर दिया । आषढ़ बदी पंचमी बार सोमवार विक्रमी सम्वत्‌ 1997 में गुरुजी आपको आशीर्वाद देकर बैकुण्ठ पधार गए । 22 वर्ष की तरुणावस्था में आपके लिए यह कठिन परीक्षा की घड़ी थी, क्योंकि गुरु के मार्ग निर्देशन से रहित आपको अपने मार्ग का स्वंय निर्माण करना था। आचार - व्यवहार में प्रौढ़ता तथा विचारों में परिपक्वता लाने के लिए एकान्तवास की आवश्यकता थी । आपने बड़ा कठोर तप किया। एक वर्ष का निराहार उपवास किया, जिसमें अन्न, दूध, नमक, मीठा या फल आदि का सेवन पूर्णतया निषिध था। केवल जंगली घास, पुवाड़ मा चौलाई आदि, बिना नमक के उबालकर दिन में केवल एक बार ही अल्प मात्र में सेवन करते थे । मन की शुद्धि तथा आत्मसंयम के लिए एक वर्ष का मौन व्रत धारण किया। तन की शुद्ध के लिए अनेक बार चान्दरायण व्रत रखे । साधारण ब्रत तो आप करते ही रहते थे । घर पर रह कर ऐसा कठोर तप करना केवल निर्लेप आत्मा से ही सम्भव है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह तथा अहंकार ज्रुओं पर विजय प्राप्त करके तथा सभी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को वश मे कर के अब आप पूर्ण सन्त बन चुके थे। ग्राम निवासी भी आपको पूज्य भक्त जी कह कर सम्मानित करने लगे थे। उस समय से अब तक आप पूज्य सन्त जी ' के नाम से प्रसिद्ध हैं।

समाज सुधार के कार्य

अब आप प्रभावशाली वक्ता तथा आदर के पात्र बन चुके थे। सारा गांव आपका आदर करता था । आपने गांव को एकता के सुत्र में बांधा तथा सार्वजनिक कार्य आरम्भ किए। आपके नेतृत्व में खेतों के कच्चे रास्तों को ठीक किया गया तथा उनकी नालियों पर छोटे-छोटे पुल बांधे गए। आपकी देख-रेख में गांव के तालाबों की खुदवाई तथा घाटों का पुनरउधार, गांव की गलियों को पक्का करवाने का श्रेय भी आपको ही प्राप्त है। समाज सुधार के कार्यों में, गांव में विद्यालय के भवन निर्माण का कार्य आपकी महान उपलब्धि है। लोगों ने आग्रहपूर्वक 21 जनवरी सन्‌ 1956 आपके कर कमलों से ही आधारशिला का कार्य सम्पन्न करवाया । सन 1986 मे बस स्टैण्ड समालखा मंडी में ठण्डे जल की प्याऊ का निर्माण कराया । आप घऱ छोड़ कर पुन: गुरुजी के आश्रम मे चले गये दिन रात यहाँ सत्संग होने लगा हर मंगलवार को सत्संगी दूर दूर से आकर सत्संग की शोभा बढ़ाने लगे आपके प्रवचन सुन कर लोग अपने को धन्य समझते थे यह कार्यक्रम लगभग एक वर्ष तक चलता रहा । ग्राम वासियों तथा सत्संग-प्रेमियों के अनुरोध पर आप पुन: ग्राम में अपने मकान पर आ गए ।

चमत्कारी जीवन

सामाजिक कार्य तो आपके लिए गौण थे, मुख्य कार्य था ईश्वर भक्ति । आपने उपासना का सरल और सुगम मार्ग लोगों को समझाया । आपके मकान पर हर मगलवार को तथा प्रत्येक पूर्णिमा को होता रहा। इस सत्संग ने शनै:- शनै वृहद्‌ रूप ले लिया। दूर-दूर से हजारों सत्संग प्रेमी इसमें पधारने लगे। सत्संग के उपरान्त आप कष्ट पीड़ित लोगों का उपचार भी करने लगे । दो-चार रोगियों का उपचार करते ही कस्तूरी की भांति आपकी सुगन्ध चारों ओर फैल गई। दूर दूर से नए और पुराने रोगी हजारों की संख्या में आए तथा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करके आपका यश गाते हुए गए जो जैसी भावना लेकर आया उसको वैसा फल अवश्य प्राप्त हुआ । आपने उपचार के लिए मनोवैज्ञानिक प्रणाली भी अपनाई। आप हाथ से केवल रोगी के माथे को छूते थे और रोग दूर हो जाता था। भूत-प्रेत संकटग्रस्त लोगों के लिए तो आपका आश्रम बाला जी बना हुआ था। आपके तप और पवित्र आत्मा का ही प्रताप था कि केवल हाथ लगाने से रोगी का रोग दूर हो जाता था और उसे सुख शांति प्राप्त होती थी । संकट मोचन के लिए, आपको कोई ' सिद्धि ' प्राप्त है, ऐसा विश्वास अभी तक लोगों का बना हुआ है। आपने पुराने से पुराना तथा भयंकर रोगों को पल भर में समाप्त करने के अनेक चमत्कार दिखाए हैं । इतना सब करने पर भी आपने किसी से कभी कोई पैसा नहीं लिया । परमार्थ के लिए आपने नि:शुल्क सेवा की ।