भजन-131

( तर्ज:- सादा )

टेक:- औरां की जड़ काटनियां कदे फला नहीं करते। ठाडा बनकै हीणे ने कती दला नहीं करते॥

1. बौली-बौली बात करै तेरा हुआ ओपरा ढंग। विनाश काले बुद्धि उल्टी पड़े करनी में भंग। सुख बिन नींद चमक बिन हाँसी मन में नहीं तरंग। तेरी बातां नै सुन-सुन के ने बिल्कुल होगे तंग। लिखी कर्म की रेख-लेख कहै टला नहीं करते।।

2. दुविधा में दोनूं गए कहैं राम मिली माया ना। बो कै पेड़ बबूल आम का फल बिल्कुल थ्याया ना। पाप का घड़ा भर कै फूटै किस-किस ने दुख ठाया ना। दीन दुखी ने बता सता के कोए भी सुख पाया ना। या काम क्रोध की आग सहम में जला नहीं करते ।।

3. के ले के ने आया था बता के ले कै ने जावै। हे लै रिजक बहाने मौत फल किस्मत का पावै। दही समझ कै रुई ने क्यूं भूल में खावै। वक्त चूक ज्या बात बीत फिर पीछे पछतावै। पाप का तेल अधर्म की बाती बला नहीं करते ।।

4. दया धर्म का मूल बताया पाप मूल अभिमान। जैसी करनी वैसी भरनी फल देगा भगवान। मार चाहे दे छोड़ मेरी सै तेरी मुट्ठी में ज्यान। चन्द्रभान कह सन्त दया से कर मेरी बात का ध्यान। लाल किरोड़ी कहैं रेत में रला नहीं करते ।।

दोहा: - जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव। कह कबीर सुन साधवा, कर सदगुरु की सेव ।।

दोहा - सच्चे गुरु के संग में, चढ़े भक्ति का रंग । नित सवाया वह बढ़ें, कभी न होते भंग ।।

भजन-132

( तर्ज: - सादा )

टेक:- ध्यान हरि में ला बन्दे तो साथी हो करतार तेरा। मुक्ति पद के पावन का एक योहे सै आधार तेरा।।

1. पांच तत्व का मेल मिलाया बन रही काया तेरी सै। मकड़ी कैसा जाल देख के आँखां बीच अन्थेरी से । साढ़े तीन हाथ की देह एक मुट्ठी राख की ढेरी सै। चलो चली हो ज्यागी एक दिन कुछ ना लागे देरी सै । मात पिता बन्धु सुत दारा यो छुट ज्यागा परिवार तेरा ॥

2. लेना एक न देने दो यहां बाट भिड़ावे क्यूं ठाली। हरि नाम के सुमरन बिन तेरी कंचन काया सै खालीं। सदा पाप का बणज करा तनै पूंजी सही लुटा डाली। धरी धराई रहज्या माया गेल बता किस कै चाली। दो गज लत्ते में तन ढक दें सब धन हो बेकार तेरा।।

3. करले कुछ तो चेत अगत का वक्त फेर नहीं आना हों। चिड़िया चुगजां खेत तेरा फेर हाथ मसल पछताना हों। दिल्ली में रहे भाड़ झोंके हक ना हक दुख ठाना हो। अक्ल के अन्धे गाँठ के पूरे तेरी गेल घिंगताना हो। अच्छे बुरे कर्म का आगे लिखा धरा फल तैयार तेरा।।

4. राधेश्याम नाम की रट दो घड़ी जलों थे लाया कर। तन की शुद्धि निर्मल बुद्धि तृष्णा दूर भगाया कर। मन की चाही शुद्ध कमाई राजी होके खाया कर। चन्द्रभान सन्त कहते तू सत्संग के में जाया कर। सन्तां के सत्संग तैं बन्दे होज्या बेड़ा पार तेरा ।। मुक्ति पद के पावन...

भजन-133

( तर्ज:- सत्संग के मां जाने तैं )

टेक : मोहन निर्मोही बन मत अबला ने तरसाओ। अखियाँ तेरी शक्ल की प्यासी भगवन दर्श दिखाओ।।

1. मैं सच्चे मन तैं दास तेरी, दो कष्ट मिटा गोबिन्द हरि। बीच भंवर में नाव मेरी, तुम आकै पार लगाओ।।

2. मनै जग से किया किनारा है, बस ले लिया तेरा सहारा है। तू जीवन साथी प्यारा है, मेरी सच्ची प्रीत निभाओ।।

3. दास जनों के संकट टाले, द्रोपदी के चीर सम्भाले । अर्जुन के बन कै रथ वाले, गीता ज्ञान सुनाओ ।।

4. काली देह में नाग नथैया, मुरली मनोहर बंशी बजैया। वृन्दावन में कृष्ण कन्हैया, प्यारी गऊ चराओ।।

5. चन्द्रभान सन्त की दासी, रोज पुकारै ब्रज के बासी खोनी होगी ज्यान टका सी, क्यूं ज़्यादा तड़पाओं  

भजन-134

 ( तर्ज:- राम राम रहा टेर )

टेक:- हे सुन बहना मेरी, धर ले हरि का ध्यान।

1. वो नर परले पार जिसने ध्यान हरि तैं लाया। भक्तां के वश भगवन हों ये वेदों ने फरमाया। आकै ने खुद दर्श दिखाया, भनक पड़ी जब कान ।

2. द्रोपदी दुष्ठों ने घेरी आकै लाज बचाई। कृष्ण कन्हैया नाम रटे तैं तिरगी मीरांबाई। सफल कमाई शबरी के खुद, घर पहुँचे भगवान।

3. सुआ पढ़ाती गनका ने थी मिलगी मोक्ष गति है। नाम रटे तैं लाज बचागी अनसुड़या नार सती है। अहिल्या तारी पार कती हे, जाने जगत जहान।

4. चन्द्रभान सन्त का कहना हे कार करी कायदे की । श्याम मुरारी ने खुश हो थी टेर सुनी राधे की । बात तेरे गुण फायदे की है, गुरु करें कल्याण ।  

भजन-135

( तर्ज:- आज रल मिल कट्टी सारी )

 टेक:- हम विनती करते बारम्बार, यह सत्संग सुखदाई हो।

1. सत्य प्रेम का दीपक जलज्या, आनन्द रूपी फूल सा खिलज्या। टलज्या सारी विपत का भार, दिन दिन कला सवाई हो।

2. रोग दोष संकट मिटें सारे, अन्न धन के भरजां भंडारे। जयकारे लावे नर नार, हर की आप सहाई हो ।

3. सत्संग में सनतों की माया, नहीं इस सौदे में घाटा आया। मन चाहया फल मिलज्या तैयार, अपनी आप भलाई हो ।

4. चन्द्रभान सन्त की युक्ति, फेरो माला नाव ना रुकती। कलियुग में मुक्ति आधार, सत्संग खास दवाई हो। विनती करते बारम्बार...  

भजन-136

( तर्ज: - चौकलिया )

टेक: राम रटे सुख धाम मिलै हर बनजां खुद रखवाले। भीड़ पड़ी भक्तों पै जब हैं आके आप सम्भाले।।

1. ध्रुव भक्त ने राम रटे तैं ऊंची पदवी पाईं। अजामेल की मुक्ति होगी तारे सदन कसाईं। साग विदुर घर खाया दुर्योधन की छोड़ मिठाई । सैन भक्त का कष्ट मिटा हर बनगे नन्दा नाई। नरसिंह बन प्रहलाद भक्त के सारे संकट टाले।।

2. धन्ने जाट की लाज बचा दी बनकै सही हिमाती । नरसी जी की टेर सनी बना सरसागढ़ में भाती । कबीर भक्त की यज्ञ रचाई प्रजा हैं यश गाती। रविदास का दुख मेटा है आज तलक भी गा। जप पिन पार तार दिए दिखा मोक्ष के पाले॥

3. झूठे बेर मजे से खाए भिलनी के घर आकै। अहिल्या असली रूप पै ल्‍्या दी अपना पैर लगा कै। द्रोपदी की दी लाज बचा मौके पै चीर बढ़ाकै। मीरां को दी परम गति तिरी गनका सुआ पढ़ाकै। देवकी की टेर सुनी दिये तोड़ जेल के ताले।।

4. बाल्‍मीकि का ध्यान ठीक हो नाम रटा हर प्यारा। बिलवा मंगल सूरदास बने जानै से जग सारा। तुलसीदास की विनती सुनी नहीं बिल्कुल किया किनार। कह चन्द्रभान चल सन्त शरण में मिलज्या मोक्ष द्वारा। सनतां के सत्संग तैं जां सब बिखर भरम के जाले॥

 दोहा:- भक्ति दान मोहे दीजिए, गुरु देवन के देव। और न कुछ मुझे चाहिए, निशदिन तुम्हरी सेव ।।

भजन-137

( तर्ज:- चलती दौड़ )

टेक : हे जी, हे जी संत जन होते पर उपकारी खुद तकलीफ उठाते पर दें औरों को सुख भारी ।

1. भेद किसे ने पाया कोन्या इनकी है निराली चाल। सनतों का करकै ने सत्संग पापी जन भी होते निहाल। लोहे का कर देते सोना हो जाते जब दीन दयाल। कांशी जी में रहते थे एक सन्त का सुनाऊं हाल। ब्रह्म ज्ञानी और समदर्शी थे हरि भजन का सच्चा ख्याल। चौबीस घण्टे रटना मन में भज गोबिन्दा भज गोपाल्। सीताराम और राधेश्याम कभी कहते कृष्ण मुरारी ।। सन्त जन...

2. एक दिन गंगा में जाके सन्त जी ने गोता लाया । होणी है बलवान जगत में ऐसी फिरगी हर की माया। गोते खाता धारा में एक जल में बहता बिच्छू आया। सन्त जी को दया आगी अपने हाथ ऊपर ठाया। बैठ हथेली डंक मारा एक दम थर्रागी थी काया। पड़ा हाथ तैं पापी छूट जल के बीच गोता खाया। अपना दर्द भूल फिर चाले पकड़न ने ब्रह्मचारी ।। सन्त जन...

3. कहने लगे लोग सन्त जी इतने क्यूं होते हैरान। हिंसक जीव बचाने में गलत जमा रहे अपना ध्यान। अपनी आदत को नहीं बदलै यह तो है एक विष की खान। सन्त जी फिर बोले हँस के इसको अपने डंक का ज्ञान। मैं अपनी आदत क्यूं पलटू पशु नहीं मैं हूं इन्सान। सत्य की होती जीत सदा सुन लो जरा खोल कै कान। सनतों के लग्जया बड्टा मैं क्यूकर मानू हारी ।। सन्त जन...

4. सन्त मिलन से उस बिच्छू के पिछली बात याद आईं। पायान में गया लिपट सन्त कै अपनी नाड़ नहीं ठाईं । खुले ज्ञान के नेत्र एक दम हरि कीर्ति थी गाई। चन्द्रभान सन्त कहते हैं परम गति उसनै पाई। सन्त समागम कर सत्संग में नीत हरि मै जा लाई करले युक्ति हो ज्या मुक्ति सन्त शरण मै चल भाई आपै मारे स्वरग मिलै नही थ्यावै चीज उधारी ।। संत जन....

दोहा : परमेश्वर में गुरु बसें, गुरु परमेश्वर मांहि। सुन्दर दोऊ परस्पर, बिन भाव कुछ नांहि।।

भजन-138

( तर्ज:- तुम करो दया गुरु महाराज )

टेक: - बहना सतगुरु धोरे चाल, तेरी कटजां यम की फांसी ।

1. लिए राख भरोसा दिल में, क्यूं फंस रही सै हलचल मैं। हे तू पल में होज्या निहाल, ना लागै देर जरा सी।

2. तेरे दाग जिगर के धोवैं, सब रोग दोष न खोवेँ । हे जब होवेँ सन्त दयाल, खुद मिल जांगे अविनाशी।

3. गुरुवों के देख जहूरे, ना रहेंगे काम अधूरे। हे तेरे पूरे होवैं सवाल, ना रहै क्यां हे की प्यासी।

4. तेरा विषयों से दिल हटज्या, सब मन की भ्रमना मिटज्या। हे तेरा कट ज्यागा जंजाल, इस दुख तैं होबे खलासी।

5. चन्द्रभान सन्त जब वर दें, तेरी सारी मेट कसर दें। बहना कर देंगे शुद्ध ख्याल, हो सच्चे मन तैं दासी।  

भजन-139

( तर्ज:- मन मोहन बनवारी )

टेक : ओ श्यामा बंशी वाले, मुझे अपने पास बुलाले। मैं तेरे चरण की चेरी, मुझे अपनी दास बनाले।।

1. मैं पूजा तेरी करती, नित ध्यान तुम्हारा धरती। हूं बण-बण डोलत फिरती, पायां में पड़ गए छाले ।।

2. मैं तेरे प्रेम में खोई, तुम बनगे क्यूं निर्मोही । मनै कर दी तैयार रसोई, आ कुछ तो भोजन खाले।।

3. मनै नहीं किसे तै डरना, रहा कोए गाम और घर ना। है तेरे नाम पै मरना, लिए पी प्रेम के प्याले।।

4. मेरी तू ही करै रखवाली, है तेरे हाथ में ताली। बन कै नै कृष्ण पाली, आ बण में गऊ चराले।।

5. चन्द्रभान सन्त की चेरी, मैं बनी दिवानी तेरी। दो दर्श करी क्यूं देरी, आ दिल मेरा समझाले।।  

भजन-140

 ( तर्ज:- सादा )

 टैक:- दो बातों को भूलै मत कभी जै चाहवै कल्याण । आने वाली मौत याद रख दूजे श्री भगवान ।।

1. जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, अग्नि का नहीं रहै मेल। पच्चीस का जा साथ छूट यो बुझज्या बाती निमड़ कै तेल। एड़ा पिंगला सुखमण छूट ले बना बनाया बिगड़े खेल। दसवां द्वार फूट ज्यागा जब काल बली की लागै सेल । दस इन्द्री दस प्राण बिगड़ सब होज्या गलत मिजान।।

2. पैदा सो ना पैद जगत में सदा किसे का वास थे । धर्म भरोटा बांधे कल का है पल की भी आस नहीं। कल करना सो करले आज ये वक्त तेरा है दास नहीं । खपर भरनी खेलै सिर पै इसकी इब तक ख्यास नहीं। उड़ज्या हंस अकेला पल में पहुँचा देवैं शमशान।।

3. घोर कुण्ड में पड़ी -पड़ी तेरी सड़ रही थी काया। नाम रटन का वायदा कर यो नर तन है पाया। काम क्रोध मद्य लोभ मोह ने रच दी है माया। इन पांचों के चक्कर में फंस ना राम भजन गाया। हर का नाम भुलाया तेरी क्यूं गूंगी हुई जबान।।

4. जिसने तुझे आराम दिए कुछ उसके भी गुण गाले। जिसा काम हो दाम भी वैसे वक्त का फायदा ठाले। चन्द्रभान सन्त कहते ये नित का नेम बनाले। सत्संग में आ शाग सवेरी मन चाहा फल पाले। मोक्ष गति मिल ज्यागी कर ले आगे का सामान।।