भजन-291

टेक : चन्द्रभान सन्त की माया हे, कोई जीव समझ ना पाया-2

1. खुद आ उतरे अविनाशी, करी सबकी दूर उदासी । पणवासी न दर्श दिखाया हे, कोई जीव समझ ना पाया॥

2. फेर पांच साल की उमर में, इनने सुरती लाली हर में। निज घर में आसन लाया हे, कोई जीव समझ ना पाया।।

3. करी रामकिशन की सेवा, मिली परमगति की मेवा। खेवा परले पार लंघाया हे, कोई जीव समझ ना पाया॥

4. फेर खेला न्यारे ढंग में, करा चमत्कार सत्सग मे हरि रंग में रंग दी काया हे, कोई जीव समझ ना पाया।।

5. प्रसाद नाम का बांटा, दुख बहुत जगत का काटा। इनकै कोन्या घाटा आया है कोई जीव समझ ना पाया

6. ये जड़े बैठगे जाके, उड़े कल समझ ना पाया। ठाकै चादर वापिस आया है कोई जीव समझ ना पाया ।

7. कई आस कर थे धन की, ये कोई जीव समझ ना पाया। ना कोई इनकी तरफ लखाया है,कोई जीव समझ ना पाया॥

8. इनने सबका पादया बेरा, म्हारै हाथ शीश पै फेरा । यो छन्द कृष्ण ने गाया है कोई जीव समझ ना पाया॥  

भजन 292

 टेक: गुरुदेव दया दातार श्री सन्त चमत्कारी । हम शरण तेरी आए तुम सुध लो हितकारी ।।

1. विश्वास बगीचे में श्रद्धा क॑ फल खिले। मन मन्दिर में गुरु जी तेरे नाम को जात जले। तुम दान दया के हो मेरे सतगुरु भडारी ।।

2. मुझे जान दास अपना मेरी अरज मजूर करा। मुझे भक्ति दान दियो मेरे अवगुण दूर करो। विषयों को मारण में तुम पूरे बलकारी ।।

3. कितने जीवन तिरगे तेरे नाम की नैया में । पंगु भी पहाड़ चढ़े तेरी कृपा छैया में । हमको भी यूं तार दियो जैसे गनका तारी ।।

4. प्रकाश करो दिल में दुख भंजन नाम तेरा । फिरता हूं दीन दुखी दया करना काम तेरा। कृष्ण के सिर पै हो धरो हाथ ब्रह्मचारी ।।

दोहा : गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिले न मोक्ष गुरु बिन लखे न सत्य को, गुरू बिन मिटे न दोष !

भजन 293

टेक : गुरु चंद्रभान के सत्संग मैं हे बता क्या की रोल मेरी बहना

1. यहाँ भजन कीर्तन हो रहे सें, हे गुरु पाप बिराने धो रहे सैं ये तो बेल धरम की बो रे सै , हे क्यां हे की ना ओल मेरी बहना

2. सत्संग सरजीवन बूटी सै, है तूँ प्रेप से पी ले छुद्ी सै। पक या भक्ति ज्ञान की घटी से, है तू पीज्या घोल पेरी बह

3. या मन की भ्रपना थमती ना, है ना तो पीरों से तूं कपती ना। देखे गुरू बचन पै जपती ना, है तूं दिल ने टटोल मैरी बहना ।

4. ये दयानिधि हितकारी सै, हे सब करते दूर बीपारी मैं । पर इतनी गलती प्हारी से, हे ना करते गौर मेरी बहना ।

5. सत्संग में जो श्रद्धा से आवै, वह मोक्ष पदी पद को पावै। यू कृष्ण लाल बगावै धड़ी, हे गुरु ज्ञान की तोल मेरी बहना।

दोहा: सतयुरु की महिमा महा, बिरला जानै भेद । भारी भ्रम भगाय कर, हरें कर्म के खेद।।  

भजन 294

 ( तर्ज:- गुरु चन्द्रभान के सत्संग में )

टेक:- थारी कैसे महिमा गाऊं हो मेरे सदगुरु देव चमत्कारी ।

1. तुम तारों बीच चन्द्रमा हो, और देवों बीच इन्द्रमा हो । घह। तुम अवतार पन्द्रमा हो, खुद विष्णु जी के अवतारी ।

2. हो बेटों के मां श्याम तू ही, है कांशी गंगा धाम तू ही । गुरु त्रेता में श्री राम तू ही, कर पाप से हीन महि डारी।

3. तेरा नहीं अन्त और नहीं शुरु, मैं कहां से बिनती करूं तक तुम भक्तों में प्रहलाद ध्रुव, और कपिल मुनि से लरबथारी .

4. ना तुपसा कोई स्वामी हो, ना मुझ सा कोई खलकामी ही। करे दया अन्तर्वामी हो, गुरू चन्द्रभान ब्रह्मचारी

5. गुरु तुम ही दीन दयाला हो , और मैं भी दीन निराला हूँ। बन ' कृष्ण ' का रखवबाला हो, कर शीश धरों तुम हितकारी

भजन 295

 ( तर्ज:- सतगुरु ने आण जगाई है सखी )

टेक: सतगुरुवों के दर पै चाल है सखी घर-घर सत्संग हो रहे सैं।

1. गराबड़ में सैं इसे महात्मा, रोग दोष का करूँ खात्मा । वे तो काटें यम के जाल हे सखी, आवागमन ने खो रहे सैं।

2. जो श्रद्धा प्रेम लेज्या साथ में, उसके रोग रहै ना गात में। वे तो भक्तों के प्रतिपाल है सखी, बेल धर्म की बो रहे सैं।

3. दो घण्टे का आसन ला लिए, सत्संग में मिलै बूंटी खा लिए। फिर हो ज्यागी तूं निहाल हे सखी, रोग मरहम का टो रहे सैं।

4. कुछ लम्पट बुगले उस गाम में, वे राक्षस मानुष के चाम में। उनते बचिए कह कृष्ण लाल हे सखी, कांटे अगत में बो रहे सैं । सतगुरुवों के दर पै.... .

दोहा : सद्गुरु सच्चा सूरमा, नख सिख मारा पूर। बाहर घाव ना दीखई, भीतर चकना चूर।।  

भजन 296

 ( तर्ज: हे जी सत्संग में आइयो )

टेक : चाल एक सन्त से मिला दूं पाप कटेंगे दर्शन में । चाल एक सन्त दिखा दूं रोग मिटेंगे दर्शन में ।।

1. रोहतक से कुल 11 मील गराबड़ है गाम जिसका। ज्ञानी, ध्यानी, त्यागी, तपस्वी चन्द्रधान नाम जिसका । अन्न का सेवन छोड़ राखा रक्षक है भगवान जिसका। राम नाम के साथी होगे हृदय नबधा भक्ति बैठी। मामूली सी चीज नहीं सै बहुत बड़ी एक हस्ती बैठी। आकै दर्शन करो सन्त के गाम बिचाले शक्ति बैठी। दसों इन्द्री कर काबू में ये बैठे हरि भजन में।।

2. सतगुरु जी के दरबारां में दिन-दिन कला सवाई हो रही भगवत गीता रामायण यहां वेदां की पढ़ाई हो रही । राम नाम का साबुन लागै तन मन की सफाई हो रही। आठों पहर ज्योति बलती बाबा हनुमान की । कमरे में तस्वीर पवित्र लछमन सीताराम की । शिवजी सती पारवती जी उस विष्णु भगवान की । ये तो सन्दक दर्शन देते आकै न सत्संग में ।।

3. ऐसा सन्त मिला कोन्या मनै हिन्द और हरियाणे में। एक कमल का फूल देख लो बैठा सादे बाणे में । सारे रोग कटैंगे तेरे सत्संग के में जाणे तै। बदरीनाथ, बनारस, अयोध्या, गढ़ मुक्तेश्वर धाम देखो । सत्संग मंडल सेवा करैगा आकै गरावड़ गाम देखो । गुरु जी की भक्ति करते सतगुरु चन्द्रभान देखो । सत्‌ की माला थमी हाथ में ध्यान श्रीकृष्ण में ।।

4 घर का जोगी जोग नहीं और बाहर का जोगी सिद्ध कहें सैं। गंगा नहाले पाप हटाले यहां पर अमृत कुण्ड बहै सैं। चाल दिखा दूं कमरे में भगवान भक्त के वश में रहै सैं। सत्संग के में आकैे चाहिए ऊंच नीच का भेद बताना। पल्ले गाँठ ला लिए प्यारे साधु सन्त को नहीं सताना। के बेरा कौन से भेष में मिलज्या त्रिलोकी का नाथ पता ना। अमीसिंह ब्राह्मण के बसे चौब्बीस घन्टे मन में ।। चाल एक संत से मिला दूँ  

भजन 297

 ( तर्ज:- तेरे लाग्या जाल भ्रम का

 टेक : नौ लख तारा बीच चंद्रमा, म्हारे सतगुरु चंद्रभान ऐ जी ऐसी भक्ति चेती, खुद आन मिले भगवान

1. एक लम्बा सा ब्रत गुरु ने, भाई करकै खूब निभाया। चौब्बीस घण्टे रहे सींचते, एक सत्‌ का बिरवा लाया। ऐसा सच्चा प्रेम दिखाया, जैसा दिखा गए हनुमान ।।

2. ये दादा रामकिशन के चेले, सैं नेकी राम के बेटे । पांचवां साल उमर का लाग्या, ये जब से भजन पै बैठे। इनने भगवन ऐसे फेटे, जैसे सुग्रीव ने श्री राम ।।

3. पूर्ण, ध्रुव, प्रहलाद भक्त तैं, म्हारे सतगुरु घाट नहीं सैं भगवन की चर्चा के अलावा, ये करते बात नहीं सैं । यहां साधुआं आले ठाठ नहीं सैं, जो पीवैं सुलफा भांग ।।

4. सत्संग मंडल जुग-जुग फलियो, जिसके रक्षक सन्त निराले। दूर अंधेरा करा शर्मा का, दिये तोड़ भ्रम के ताले। ये ऐसी सुरती धरने आले, ना होवै धर्म में हान।। हे जी ऐसी भक्ति चेती...  

भजन 298

 टेक : चालो देन बधाई हे, है नेकी

1. पणवासी के आठ बजे थे, सब बाता के ठाठ सजे थे कातिक की घड़ी आई है, हे 1975 का साल सै

2. धरती पै जीब बढ़ पाप हे आवे खुद भगवान आप हे करण धर्म की लड़ाई हे, हे जान्नु राज्य छतरसाल सै करण धर्म की लड़ाई हे, हे वै पाँचू पांडव साथ सै

3. श्यान शक्ल का प्यारा लागै, देख कै प्रेम दिलों में जागै। आ गए कृष्ण कन्हाई हे, हे दुष्टों के लिए काल सैं। आ गए कृष्ण कन्हाई हे, हे भक्तों के प्रति पाल सैं।

4. कौन से जन्म का फल तनै मिलग्या, घर में फूल कमल का खिलग्या। म्हारा भी भाग पूर्वला जगग्या, चन्दा जैसा सतगुरु मिलग्या।

5. युग-युग जीओ सतगुरु म्हारा, दुखियों के लिए एक सहारा। ल्‍या दे म्हारी मिठाई हे, हे कित बूली धरा थाल सै।

6. कृष्ण लाल ब्राह्मण गावै, सतगुरु चन्द्रभान मनावै। सत्संग मंडल गुण थारे गावै, सतगुरु चन्द्रभान मनावै। गाव शब्द बधाई हे, हे म्हारा सतगुरु राखै ख्याल सै।