भजन-11

( तर्ज:- नागिन मेरा दिल ये पुकारे आज्या ) टेक: है दो दिन दर्शन मेला, फिर उड़ज्या हंस अकेला। क्यूं ना हर का नाम ले, जो गिरते न थाम ले। है दो दिन...

1. दस इन्द्री द्स प्राण बिगड़ जां तेरे । एडा पिगला छूट कूच हों डेरे। घेरे डाल देगा काल, रहै धरा धराया माल, तेरे साथ चलै ना धेला

2. माता पिता सु दारा पाट मन न्यारे। जीते जी के भाई बंधु सारे । प्यारे धबी अशनाई सबने आँख चुराई, तू किस घमंड में खेला ।

3. के कहैगा जा धर्मराज कै आगै । काम, क्रोध, मद, लोभ ने क्यू ना त्यागै। लागै हाथ कुछ भी ना, चालै साथ कुछ भीना, मिलैएक पतला सा सेला।

4. तुरिया पद में आसन ला फंद कट ले। है दुनिया मुसाफिर खाना दो दिन डट ले। | तू रट लेन भगवान, कहगरावड़ का चन्द्रभान, गुरु राम सरूप का चेला।

वार्ता: माता बूली देवी की बातों को चन्दू लाल से छोटा और मोती लाल से बड़ा लड़का जिसकी आयु पांच वर्ष की थी, सुन रहा था । उसे नींद नहीं आ रही थी। जब माता गुनगुना कर थम चुकी, तो पांच वर्षीय बालक चन्द्रभान ने अपनी माता से इस प्रकार प्रश्न किया।

भजन-12

( तर्ज:- घर आया मेरा परदेशी ) तन्नै नही क्यु आ रही री, आंख किसी पथरा रही री।

1. बात बता दे सारी री के मन मन मै बतला री ठाड़ू बोल के बात सुना, लाग्या कुछ भी नही पता।

2. के सिर पै विपता ढो रही सै , तू दुख की चाकी झो रही सै। तु नहीं रात नै सो री सै कीसी उचाटी हो री सै के लगी ओपरी तेरै हवा लाग्या कुछ भी नही पता

3. जो कुछ भी तनै बात कही, सुन ली सारी सही -सही । रात आधी तै बीत गई, ले गिरते न थाम वही । के कह री सै दे समझा, लाग्या कुछ भी नहीं पता ।

4. चंद्र्भान का करले ख्याल, रो रो पर ज्यागा तेरा लाल । सारा खोल सुनादे हाल, कुछ भी नहीं अड़ैगी ढाल । ना तो लूंगा सिर फुड़वा, लाग्या कुछ भी नहीं पता ।

वार्ता:- राज हट, त्रिया हट और बाल हट प्रसिद्ध हैं। जब पांच वर्षीय शिशु की इतनी उत्सुकता माता ने देखी तो कहने लगी बेटा मैं भगवान को याद कर रही थी वह सबका बेड़ा पार करता है। बच्चे ने भगवान के बारे में माता से पूछा तो माता बूली देवी ने इस प्रकार जवाब दिया ।

भजन-13

( तर्ज:- संगीत दौड़ ) टेक:- भगवान रटनिये भक्त सदा हुए पार ।

1. भ्रणवान भक्त के बस में हो सै वेद मां लिखा पाया ।

दुर्योधन की मेवा त्यागी विदुर घर साग खाया ।

आप बने हर नन्दा नाई सैन भक्त का कष्ट पिटाया ।

नरसी का गड़वाला बन कै सरसा गढ़ में भाती आया ।

देखै थे नर नारी सारे पल में रची निराली माया ।

हरनन्दी के भ्रात भरा था सबा पहर स्वर्ण बरसाया ।

अटके हुए भक्तां के सब दीने कारज सार।।

2. उतानपाद राजा जिसके लड़के का था श्रुव नाम |

मौसी ने दी लात मार छुटा दिया घर थक |

नम नारद मुनि गुरु कर कै सीधा मिलग्या दि

हिरणाकुश के प्रहलाद ने छोड़ा नहीं क पर्वत पर तै गेर दिया अग्नि में जला न चाम |

खम्ब से लिपटा दिया करकै ताते लाल थाम |

खम्ब से नरसिंह निकले झट करा पापी का सहार।।

3. कबीर भक्त की प्रभु जी नै आप आकै यज्ञ रचाई ।

धन्ने जाट की लाज राखी तारे पार सदन कसाई ।

गज और गिरह लड़े जल भीतर गज की आकर करी सहाईं।

सूआ पढ़ाती गनका तारी द्रोपदी और मीरां बाई ।

भिलनी के झूठे बेर खाकर दिल आनन्दी छाई ।

नर्वदा सी सती तारी अनसुड़या की लाज बचाई ।

सत्‌ की धजा डिगी नहीं हुए देव तलक लाचार।।

4. वर्धमान महाबीर बुद्ध की भी मेटी चास।

चेतन विलोचन तारे पार तारे रैदास।

मरा मरा कह राम ध्यागा बाल्‍्मीक की पूरी आस।

कोड़ी ने कण हाथी ने मण सबकी रखता मन में ख्यास।

21606 अनमोले मत ना खोवै वृथा सांस।

चन्द्रभान गरावड़ का कह मिल्ज्या पर्चा तुरंत खास हर की माला रटकै तूले अपनी अगत सुधार।

वार्ता:- माता ब्ली देवी की तातों का बच्चे के दिल पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उसी दिन से राम नाम धुन में लीन रहने लगा । घाम और ज्ञान का चटका ही होता है। बच्चा राप नाम में इतना पगन हो जाता है कि खाने पीने की सुध ही नहीं रहती । सदा एकान्त में रहना। किसी के साथ खेलना, कूदना या हँसना उसे नहीं आता था। राम नाम के सिवा उसे कुछ नहीं भाता था । एक दिन पाता बूली देवी जब उसे रोटी खाने के लिए कहने लगी तो उस पांच बर्ष के बाल भक्त ने इस प्रकार उत्तर दिया।

भजन-14

( तर्ज:- शब्द जिनकी बुद्धि माड़ी ) टेक:- री सुन माता मेरी राम नाम लगे प्यारा।

1. सात पिता और कुटुम्ब कबीला जितना भाई चारा।

दो दिन की मोह माया से सब झूठा धुंध पसारा।

ही सुन माता मेरी राम नाम लगे प्यारा ।

2. महल हवेली कोठी बंगले कमरा और चौबारा।

धरा धराया रह ज्यागा यो धन का सब भंडारा।

री सुन माता मेरी राम नाम लगे प्यारा ।

3. दसवां द्वार फूट कै एक दिन होज्या कूच नगारा |

गम नाम के सिवा कोए ना बनै हिमाती म्हारा री सुन माता मेरी राम नाम लगै प्यारा ।

री सुन माता मेरी राम नाम लगे प्यारा।

4. राम नाम्की नैया मे री मिल ज्या सही किनारा

भगवान भक्त के बस मे हो नही राम भजनिया हारा

री सुन माता मेरीराम नाम लगै प्यारा

5. चंद्र्भान गरावड़ का कहै जिसनै हरी पुकारा

आवा गमन तै पैंडा छूट हो ज्यागा निसतारा

री सुन माता मेरीराम नाम लगै प्यारा

 वार्ता:- इस प्रकार बाल भक्त राम नाम की धुन में मस्त रहता । चने के दाने उठा-उठा कर राम नाम कहता और मटके में डाल देता । इस तरह कई मटके राम नाम के दाने छोड़-छोड़ कर भर दिए । यह क्रम 7 वर्ष तक चलता रहा। जबकि बाल भक्त की आयु 2 वर्ष की हो गई। विक्रमी सम्बत्‌ 1987 आ पहुँचा । उस समय गरावड़ गांव में इसी गांव के निवासी दादा रामकिशन ब्रह्माचारी की प्रसिद्ध ला पल पी । विक्रमी सम्बत्‌ 975 कातिक वाली कारण दादा जी को कक कया या इस या था। अपने इकलौते पुत्र मांगे राम का दाह संस्कार कातिक बदी 3 विक्रमी सम्बत्‌ 975 के दिन करके वह बाहर तपस्या के बाद बम समाधि लगाकर बैठ गए थे। कठोर आपके दर्शन से लाभ सिद्धि प्राप्त हो चुकी थी। गांव के लोग दिन बाल भक्त निगम आपके आश्रम पर जाते थे। एक में दादा जी से बड़े भाई चन्दू लाल ने बातों-बातों इस प्रकार जिकर किया

भजन-15

 ( तर्ज: - चौकलिया ) रकः- दादा जी मेरा छोटा भाई राम राम टेरै सै। चना के मनिये बना बना एक मटके में गेरै सै।।

।. चौबीस घन्टे मगन रहै लगा राम नाम का खटका।

नहीं किसे तै बोलै चालै आनन्द हो ले लटका। म्हारे घर में हो रहा सै एक देखन जोगा झटका ।

राम नाम कह गेरे दाना भर दे ठाढ़ा मटका ।

भक्ति की सै चसक खास या जच रही मन मेरे सै।।

2. सब कुनबे तै रहै न्यारा नहीं पास बैठना चाहवै।

अपने विचार में लीन भूलज्या रोटी तक ना खावै।

छिक के तने तुड़ा लिए हमने वह न्यारा बैठा पावै।

राम-राम कह राधेश्याम वह गीत हरि के गावै।

माला बिना राम के नां ने मन मन में फेरै सै ।।

3. खेल कूद तै नफरत उसने आछे ना लागें साथी ।

हरदम बैठा रहै ध्यान में हँसी तक ना आती ।

राम नाम की रटना सै कौए और चीज ना भाती ।

शेर पिंजरे घिर रहा सै नहीं राही आगे पाती ।

गुरु विद्या बिन पार नहीं वह इलै बिन बेर सै ।।

4. मेरे कहे तै दादा जी तुम इतना कष्ठ उठालो।

मेरे छोटे भाई चन्द्रभान ने अपना दास बना लो।

काथ सहारे लोह तिर ज्या बस इतना धरम कमा ल्यो

ग्यान उपदेश देन की खातर तुम अपने पास बुला ल्यो

गुरु मंत्र दे पास करो या अर्ज मेरी तेरे सै

वार्ता :- चन्दू लाल की बात को सुनकर दादा जी ने मन मे विचार किया मेरे पुत्र की मर्त्यु भी इसी वर्ष उसी महीने में हुई थी और इस बच्चे का जनम भी उसी महीने का है हो सकता है भगवान ने इसी रूप मे बच्चा पिता के पास भेज दिया हो अर्थात अबकि बार गुरु और चेले का नाता हो 12 वर्श कि पुरानी बात फिर से ताजा होगै और इस प्रकार से सोचने लगे!

भजन-16

( तर्ज:- नागिन मन डोले ) टेक:- सुन के हाल, गया बदल ख्याल, दिल में उनमान करा, मन मन में सब हाल फिरा।

1. बारह साल की बात पुरानी बाबा के दिल पै आगी।

अगला पिछला जोड़ लगा के मन में खुशी अति छयागी ।

तड़फते हुए रोगी की हकीम ने नाड़ी थ्यागी।

धोरे आ मरीज ने दवा पागी।

इब रोग कटै, सब दर्द मिटै, न्यू मन में जोश भरा, खुशी में कहगे बोल खरा।

2. कातिक महीना साल पिछतर फिरी हरी की थी माया

इसी साल में मेरा पूत भी स्वर्ग लोक को था ध्याया।

इस लड़के का जन्म भी उसी मास में बतलाया।

हो सकता है इसी रूप में हट कै फिर मिलने आया।

बाहे मूरत हो, दूजी सूरत हो, पिछला संजोग मेरा, मन में एक एक हरफ जरा।

3. राम समारै काम किसे के मां के आके दया करैं।

सच्ची लग्न लगी हो पूरी ना काम अधूरे रहा करैं।

दुःख-सुख का जोड़ा हो सै भक्त कष्ट न सहा करैं।

देर है अन्थेर नहीं न्यूं बडे-बडेरे कहा करैं।

नई जोत जलै, नया गुल खिलै, हो सूखा बाग हरा, रहै भक्ति का पेड़ निरा।

4. घी तो अन्धेरे में दीख जा कहता जगत जहान है।

असली नकली हीरे की तो जौहरी ने पहचान है।

पूत के पां पालने पिछणै लाग्या ठीक मिजान है।

चेले की सूरत में मिलता दीखै चन्द्रभान है।

नहीं लगे रोक, जा स्वर्ग लोक, जिसने हर का ध्यान धरा, ओहे भवसागर पार तरा।

वार्ता: - दादा जी ने चन्दूलाल से कहा कि बालक को मेरे पास भेज देना । परन्तु 2 वर्षीय बाल भक्त श्रद्धा होते हुए भी दादा जी के पास संकोच के कारण नहीं गया । जब दादा जी को पता लगा बाल भक्त शर्म के कारण नहीं आया तो वह स्वयं अपने स्थान से आपके स्थान पर आए उस समय भी बालक इस प्रकार भगवान का भजन कर रहा था

भजन-17

( तर्ज:- शब्द ) टेक:- बन्दे डटना सै दिन चार संसार मुसाफिर खाना !

1. क्यु कर्ता है मेरी मेरी, कौन सी चीज बता है तेरी ।

एक दिन काल आ देगा घेरी, जा खाली हाथ पसार, यह सब हो माल बिगाना। |

2. लाखों मुसाफिर रोज यहां आते, मोह माया में फंस हैं जाते।

आखिर को देखे पछताते, ये ठगी का बाजार । तेरा लुटज्या सभी खजाना।

3. लाख चौरासी कड़ी का फंदा, दुनिया है एक गोरख धन्धा ।

जान बूझ क्यूं हो रहा अन्धा, डूबैगा मझधार, ले आँख खोल मस्ताना।

4. चन्द्रभान गुण हर के गाले, अपना जीवन सफल बनाले।

एक दिन मोक्ष की पदवी पा ले, हो भवसागर तैं पार, हो तेरा लगज्या सही निशाना

वार्ता :-इस बाणी को सुन कर दादाजी की भी बंछे खिल गये और प्रसन्न हो बाल भक्त के सिर पर हाथ रख दिया । बालक ने भी चरण छू लिए । इस प्रकार गुरु और चेले का मिलन इुआ। गुरु जी ने इस प्रकार उपदेश दिया

भजन-18

( तर्ज:- सादा चौकलिया ) टेक: अलख निरंजन सब दुख भंजन जग की हाथ नकेल रहै। ज्ञो सच्चे दिल तै रटा करै वह हरदम उसकी गेल रहै।।

1. सुन्दर महल बना दी काया यह सब काम उसी का है।

बच्चीस खिड़की दस दरवाजे ये चौखट थाम उसी का है।

दस सन्तरी देते पहरा हर इन्तजाम उसी का है।

जांच सेवक शरीर की गेलां दिया आराम उसी का है।

त्रिगुणी माया से जड़ चेतन की हरदम सींचता बेल रहै।।

2. चित चरोवन की खातिर हो पांच ठगों का राज कभी ।

मौका लगते दा मारै झपटै चिड़िया पै बाज जभी ।

मन के बहलावण खातिर ब्जैं अनहद बाजे साज सभी ।

जीव पुरंजन बहु पुरंजन के होते हैं सिद्ध काज तभी ।

एड़ा घिंगला सुखमण लैम्प नस-नस में वह देता तेल रहै।।

3. जर्रे जर्रे रोम-रोम में हरदम करता बास वही ।

पाप-पुण्य की डायरी लिख के सबकी रखता ख्यास वही

भगवान भक्त के बस में सेवा करता बनकै दास बही ।

ज्ञान चक्षु से देखा जा तो बिल्कुल रहता पास वहीं ।

नौ नाड़ी बहत्तर कोठां में वह बाजीगर जिसा खेल रहें।

4. धीरज बिना धारणा किसी विचार लिन ध्यान नहीं मिलता ।

ठोकर बिन रच सम्भले मानस गुरू बिन ज्ञान नहीं मिलता

कर्म बिन पूजा फल गरावड़ के चन्द्रभान नहीं मिलता !

योग साधन रतन बिना कहते भगवान नही मिलटां कर्म बिन पूजा फल भगवान नहीं सिसता |

रमन से राम राम से मुक्ति मोक्ष पदी पर मेल रहै

वार्ता: इसके बाद दादा जी बालक को अपने आश्रम पर ले जाते हैं और स्वयम्‌ अपने मुह से भक्त जी कह कर पुकारने लगे। दस वर्ष तक भक्त जी ने गुरु जी की खुब सेवा करके शिक्षा दीक्षा ली और अपनी परिक्षा मे पास निकले

भजन-19

( तर्ज:- राधेश्याम ) साल सतासी फागुन शुदी तीज बुधवार बताते हैं। बाल भक्त को ले ब्रहमचारी अपने आश्रम आते हैं।।

गुरु मंत्र दे ऋद्धि -सिद्धि भक्ति का पाठ पढ़ाया था।

भवसागर से पार तरन का रास्ता सही बताया था।।

दिन-रात रहै वहां बाल भक्त हरि कीर्तन गाने लगे।

गउ बछ्दे की सेवा करके पुन्य का काम किया भारी

आम के आम गुठल् के दाम खुश होगे थे ब्रह्माचारी ।

काम क्रोध मध लोभ तज दृढ़ अपना विश्वास करा ।

शिक्षा दीक्षा दी गुरु ने भक्ति के मां पास करा ।।

व्रद अवस्था हुई गुरू की उमर आखरी आ रही थी।

ठट्ढी पेशाब निकले खाट में हुई सब तरियां लाचारी थी।।

बाल भक्त ने श्रद्धा से सेवा खूब बजाई थी ।

नहीं मन में कभी गिलानी आई टट्टी तलक उठाई थी ।।

साल सतानवे साढ़ बदी पांचम का दिन आया था।

मौत से हल्ला बोल दिया दिल बाबा का घबराया था।॥

चद्रभान गरावड़ के दिन लवै मौत के आन लगे।

बाल भक्त से ब्रह्मचारी यों समझा कै फरमान लगे।।

वार्ता:- जब गुरु जी का अन्तिम दिन आ पहुँचा तो उन्होंने बाल भक्त श्री चंद्रभान जी से कहा कि मेरे मरने के बाद तुम घबराना नहीं । मैं तेरी गुरु- भक्ति और सेवा से बहुत ही प्रसन्न हूं। तेरा हर समय हर कदम पर पथ प्रदर्शन करूंगा । मेरा शुभ आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा ।

भजन-20

(तर्ज:- गुरु जी का आशीर्वाद सादा ) टेक:- तनै चेला कहूं या बेटा कहूं चाहे समझूं गोती नाती। करी खुशामद नेह लाकै मेरी सीली कर दी छाती ।।

1. मनै धर दिया सिर पर हाथ सही तेरी रक्षा कं बनवारी।

ऊंचा दर्जा पावै मेरे तैं बाल भक्त ब्रह्मचारी ।

सन्त कहै दुनियादारी जा दूर-दूर तक ख्याती ।।

2. अपमन्यु की ढाल तनै पूरा प्रण दिखाया

गुरु चेले का नाता जो तनै सारा फर्ज निभाया |

तेरा यश जा गाया, सेवा कर मेवा मिल जाती ।।

3. पैदा सो ना पैद मौत तो एक दिन सबने खावै ।

मरी मौत की सुनके सहम क्यूं ढीले होठ लटकातै।

मत दिल में घबरावै, तेरा मैं हरदम रहूं हिमाती ।।

4. चन्द्रभान ले जमा ध्यान नहीं रहैगा काम अधूरा ।

तेरी दिन-दिन कला सवाई होगा देखन जोग जहूरा।

अपना फर्ज करें जा पूरा, न्यू गीता भेद बताती ।।

वार्ता:- गुरु का आशीर्वाद सुनकर भक्त जी प्रफुह्लित हो उठे । उत्तर तो क्या देते । अत: गुरु महिमा का ही वर्णन इस प्रकार करने लगे।