भजन -181
( तर्ज:- ले भजन हरि का कर बहना )
टेक:- बिन सत्संग जमता ध्यान नहीं, हे सतगुरु बिना मिले ज्ञान नहीं,
1. जै गुरु वचन पे डट ज्यागी, तो लाख चौरासी कट ज्यागी। घिरे फन्दे के मां ज्यान नहीं, हे सतगुरु...
2. राम भजन के गाए बिना, हे शरण गुरु की जाए बिना। तेरी मंजिल हो आसान नहीं, हे सतगुरु...
3. सत्संग में हर के दर्शन, मिलें सीता राम राधे कृष्ण। रहै दूर कती भगवान नहीं, हे सतगुरु...
4. सत्संग में बहै गंग धारा, गुरु समझाकै करें निस्तारा। पर सेवा बिन कल्याण नहीं, हे सतगुरु...
5. कह चन्द्रभान गम खा बहना, तू सन्तों के दर जा बहना। ये पांच करें हैरान नहीं, हे सतगुरु...
भजन-182
( तर्ज:- हां ए जै राम भजन पै डटज्या )
टेक:- हां ए ले राम भजन की माला, हरि आप बने रखवाला।
1. राम नाम की हो मतवाली, जगज्या ज्योति एक निराली। हा ए सब मन का मिटज्या काला, हरि आप बने रखवाला।
2 . मीरा ध्यान हरि का धरगी, गिरधर कह के पार उतरगी। हाँ ए था राम रटन का ढाला, हरि आप बने रखवालां।
3. रोकै कृष्ण नाम पुकारा, सभा बीच आ दिया सहारा। हां ए द्रोपदी का संकट टाला, हरि आप बनै रखवाला।
4. राधा, रुकमण, कुब्जा प्यारी, तृष्णा मेटी सबकी सारी। हां ए कर करके ढंग निराला, हरि आप बने रखबाला
5. शबरी ने घरां राम बुलाए, झूठे बेर मजे ले खाए। हां ए आ बण में भगत सम्भाला, हरि आप बने रखवाला।
6. चन्द्रभान कह टहल बजाकै, सन्तों के सत्संग में आकै। हां ए जा टूट भ्रम का ताला, हरि आप बने रखवाला।
भजन-183
( तर्ज:- सादा )
टेक:- क्या-क्या कह के आया था यहां किया नहीं कुछ आकै। करके प्रण निभाया ना के कहैगा आगै जाके ।।
1. हाथ जोड़ कह रहा था बेड़ा पार करो मेरा। घोर कुण्ड से बाहर निकल मैं नाम रढूं तेरा। गया नशे में टूल भूल ना राम नाम टेरा। काम क्रोध मद्द लोभ मोह ने जाल फैला घेरा। आशा तृष्णा ममता में हुआ राजी मन बहलाकै ॥
2. कुटुम्ब कबीला गोती नाती जितने जिगरी प्यारे। मरते गेलां मरे नहीं हो जीते जी के सारे। एक दिन माल पराया हो ये छूटैं महल चुबारे। दुख देवा हो ज्यान के लेवा नकली सभी नजारे। दो दिन के मनोरंजन में क्यूं बैठे धोखा खाकै ।।
3. सौ दिन चोर के एक दिन शाह का पोल तेरी खुल जानी। आई बाई भूलैगा नहीं जगह लुहकन ने पानी । हेरा फेरी नहीं चलै वहां होगी साच बतानी। कुकर्म तजकै सुकर्म करले सुन सतगुरु की बाणी। मकड़ी कैसा जाल जगत क्यूं मरता नाड़ फंसा कै ।।
4. चन्द्रभान सन्त का कहना जाया कर सत्संग में । जन्म-जन्म के पाप करें सैं नहाले निर्मल गंग में । अपने मन ने सही टिका ले रंगा राम के रंग में । राधेश्याम नाम का मन्त्र रम ज्यागा अंग-अंग में। वायदा माफी हो ज्यागी तेरी हरि कीर्तन गा कै ।।
दोहा:- चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय।।
दोहा: - चक्की चले तो चलन दे, तू काहे को रोय। लगा रह जो कील से, बाल न बाँका होय।।
भजन-184
( तर्ज: - हरे राम मुख बोल )
टेक:- खो दिया जन्म फिजूल, हरि का स्मरण कर।
1. पांच विषयों ने कर दिया अन्धा, पकड़ लिया क्यु गंदा धंधा रहा नशे में टूल, हरि का स्मरण कर।
2. कंचन जैसी काया तेरी, एक दिन बनै राख की ढेरी । मिलै धूल में धूल, हरि का स्मरण कर।
3. तुरिया पद में लगा समाधि, मिटज्या जन्म-मरण की व्याधि घलै स्वर्ग में झूल, हरि का स्मरण कर।
4. झूठी करता खेल खिलारी, पल में बौर बिखरज्या सारी। आँख रही क्यूं फूल, हरि का स्मरण कर।
5. चन्द्रभान सनतां का निरना, जै चाहवै भवसागर तिरना। ओम नाम मत भूल, हरि का स्मरण कर।
भजन-185
( तर्ज:- साथन आओ हे)
टेक:- बहना मेरी हे, मत ओम हरि को भूल।
1. जिसने नर तन तुझे दिया हे, बदले में कुछ नहीं लिया है। भाड़ा और मसूल, बहना मेरी है।
2. झूठे जग की झूठी माया, मूर्ख बन क्यूं जी ललचाया। गई विषयों में टूल, बहना मेरी है।
3. तेरी करनी आगै आवेगी, बता आम कहां से खावैगी। जै बोदी तने बबूल, बहना मेरी हैं। 4
. कट ज्यागी तेरी अमर बीमारी, ओम रटे से धूज्या सारी । जो मन में जम रही धूल, बहना मेरी है।
5. चंद्र्भान सन्त की शिक्षा, नाम रहे से होन्या रक्षा कुदरत का है रूल, बहना मेरी हे
भजन-186
( तर्ज:- भज गोबिन्द गोपाला )
टेक:- ले हरि भजन का धन्धा तो कटज्या फंदा तेरा है
1. वा सुनी हो मीरां बाई, थी हर तैं सुरती लाई । हे खिलगी थी रोशनाई, सब मन का मिटा अंधेरा है।
2. ध्यान हरि का धरगी, ले तोता राम समरगी। वा गनका पार उतरगी, मिटा चौरासी का फेरा है।
3. ले हरि 3 की माला, तो होज्या ढंग निराला। द्रोपदी का संकट टाला, जब नाम हरि का टेरा है।
4. चन्द्रभान सन्त का कहना, ले मान ध्यान कर बहना। हे राम भजन दे लहना, जै जा कुछ बीज बखेरा है। ले हरि भजन का धन्धा...
भजन-187
( तर्ज:- जो गुरु वचन पै डटगे )
टेक:- हां रै हरि रक्षा करेंगे तेरी, ले ले राम नाम की ओट।
।. रटना ला मिलजां अविनाशी, नहीं लगैगी देर जरा सी। लाख चौरासी कटजां फांसी, नहीं सताबे जम की चोट।
2. जिनने समझे अपने प्यारे, अन्त में धोरा धरजां सारे। राम नाम के ला जयकारे, तार फेंक या पाप की पोट।
3. नाम रटे शुद्ध होज्या काया, तीन ताप का बने नहीं सतावै ममता माया, मन के मिटजां सारे खोट ।
4. चन्द्रभान ये सन्त बतावं, राम नाम चित से जो गावे । शरण गुरु की निशि दिन जावै, पांचों की हो फीकी घोट। हां रै हरि रक्षा करेंगे...
भजन-188
टेक:- चिड़िया चुगजां खेत रूखाला फेर पछताए के हो। वक्त चुकज्या बात बीत रो रो डकराए के हो।
1. रावण लंकपति ने सुर्ग में पैड़ी लानी चाही। सोने में सुगन्धी अग्नि का धुआं मेटूं जल की काईं। मन की मन में रहगी सारी ना एक भी होने पाई। एक बाण में बेबस हुआ जब पहुँच गए रघुराई । फेर लक्ष्मण पूछे बात ज्ञान के तीर चलाएं के हो॥
2. शिव धनुष तोड़ राम ने ब्याह ली जनके दुलारी परशुराम ने पता लगा झट आया दे किलकारी लाल हो गुस्से में गरजा ना खोटी भली विचारी | जीभ कालजे लाके राम ने चार कला थी साहरी वा ज्योति गई चाली ठाली फरसा ठाए के हो ॥
3. बली राजा ने सो यज्ञ रच इंदरासन लेना चाहा निनानवें यज्ञ पूरी करके था सौंवा यज्ञ रचाया बौना बन आया ब्रह्मचारी रची निराली माया। तीन पग धरती मांगी आ हर ने अलख जगाया। पतंग टूट कै उड़गी झूठी डोर हिलाएं के हो ।।
4. वक्त चूक कै बाली रोया छोड़ जगत का खलका। ठोकर लागी पर्दा हटा अज्ञान रूपी मल का। कल करना सो आज करे नै नहीं भरोसा पल का। चन्द्रभान सन्त कहैं जो खास काम हो बल का। सिर पे आ बने करै सामना गात बचाएं के हो ।।
भजन-189
( तर्ज:- मैं सन्त नाम का मस्ताना )
टेक:- यह नया वर्ष सुखकारी हो, रक्षक गोबिन्द गिरथारी हों।
1. जोत निराली सही चसै, और आनन्द से संसार बसै। बस विनती यही हमारी हो, रक्षक गोबिन्द गिरधारी हों।
2. अन्न धन के भंडार भरें, सब राम नाम से प्यार करेैं। यह देखकर आनन्द भारी हो, रक्षक गोबिन्द गिरधारी हो।
3. विघ्न क्लेश मिटै सारा, हो रोग दोष से छुटकारा । या सुख में प्रजा सारी हो, रक्षक गोबिन्द गिरधारी हो।
4. रहै सन्तों की छत्र छाया, और हरि कीर्तन जा गाया। कह चन्द्रभान नहीं हारी हो, रक्षक गोबिन्द गिरधार हैं.
भजन-190
टेक : ले राम नाम की माला, तो काला मिटज्या मन का है।
1. तेरी विषयों में बिन्धगी काया, बन मूर्ख जी ललचाया। नहीं साथ चलैगी माया, यह चस्का है दो दिन का है।
2. यह कहते हैं नर-नारी, थी कटगी सब बेमारी। बा मीरां पार उतारी, था ध्यान धरा भगवन का है।
3. तोते का संग करकै,, ले माला राम सुमर कै । है ध्यान हरि का धरकै, वा पार उतरगी गनका हे।
4. जब बहुत घनी दुख पागी, तो सुरती सही जमागी। वो ड्रोपटी लाज बचागी, रट नाम श्री कृष्ण का हे।
5. यह है सनतों की शिक्षा, ले राम नाम की भिक्षा। कह चन्द्रभान हो रक्षा, सब संकट मिटैगा तन का है।
दोहा :- दौलत की दो लात हैं, तुलसी निश्चय कीन। आवत अन्धा करत हैं, जावत करत अधीन ।।
Please enable JavaScript in your browser to view the content