भजन-171

 ( तर्ज:- सादा )

टेक: भजन किर्तन सत्संग बिन तन्नै वर्था जीवन खोया हरि ओम ने भूल बहम में सहम अंधेरा ढोया।।

1. अपना रंग दिखा मोहगी या माया फिर लुटेरी। पांच ठगां ने लाकैे झाड़े नस-नस जकड़ी तेरी। तीन ताप ने जादू कर दी चौगिरदे तैं घेरी। अन्धा कर दिया दसों ने हुई आँखां बीच अस्थेरी। पी कै प्याला अनछानी का आँख मीच कै सोया।।

2. देख पराई चोपड़ी क्यूं अपना जी ललचावै। आला सूखा खा पी पानी क्यूं ना प्यास बुझावै। औरां का गल काटै सै पर अपनी खैर मनावै। लाकै पेड़ बबूल बतादे आम कहां से खावै। पीछे क्यूं पछतावै पहले बीज बिघ्न का बोया।।

3. पांचों तंत बिगड़ जां तेरे बन्द होजां नौ नाड़ी । जीभ तलक भी ना उथलैगी बिल्कुल भिचजां जाड़ी। एक दिन काल अचानक आ तेरी उजड़ैगी फुलवाड़ी । धर्मराज तनैं बूझैंगे के कहै गा चाल अगाड़ी। पूंजी नहीं पास में तो क्यूं गूजर झगड़ा झोया।।

4. चन्द्रभान सन्त का कहना देख लियो अजमाकै। सत्संग में एक आध घड़ी जै बैठो आसन लाके। आगे का सुख हो ज्यागा इब थोड़ा सा दुख ठके। मुक्ति की गारन्टी मिलज्या हरि कीर्तन गाके। हरे राम की गंगा में जा मन का मैला धोया।।

दोहा:- वस्तु कहीं ढूंढे कहीं, केहि विधि आवै हाथ | कह कबीर वस्तु पाइ़ये, भेदी लीजे साथ।।

दोहा: - भेदी लीन्हा साथ में, वस्तु दी लखाय। कोटि जन्म का पंथ था, पल में पहुँचा जाय।।

भजन-172

 ( तर्ज:- तुम किसी भूल में सोई है )

टेकः- विनती सुन नन्दलाल तूही, हो मनै शरण लई सै तेरी।

1. कौरू कार करें बेढ़ंगी, सभा बीच में करते नंगी। तंगी हो फिलहाल गई, हो आ तुझ बिन डूबा ढेरी।

2. दुर्योधन के ख्याल हुए गन्दे, कार नीच करै ओछे धन्थे। फंदे के मां आज फही, हो दुष्ठों ने अबला घेरी।

3. द्रोण पितामह नहीं हिमाती, पांच पति पर धड़के छाती। साथी मैं तनैं मान रही, हो आज लाज बचादे मेरी ।

4. सुन ले टेर द्वारका वासी, आन काट दे गल की फांसी। हाँसी होज्या और नई, हो तनैं कहां लगा दी देरी।

भजन-173

तर्ज : बंदे दो दिन का मेहमान

टेक : भज गोबिन्दा भज गोपाल केशव माधव दीन दयाल

1. मुरली मनोहर बंशी बजैया गोपनियों मे रास रचैया श्याम मुरारी कहैं नन्द लाल, केशब माधव....

2. जय यदुनंदन बांके बिहारी नाग नथैया हो गिरघारी। दुष्ठों के तुम बनगे काल, केशव माधव.....

3. मीरां के प्रभ गिरधर नायक द्रोपदी के बनगे पायक। सभा बोच आ करी सम्भाल केशव माधव ......

4. जो ले हैं तेरा सहारा, उनका बेड़ा पार उतारा। भक्तों को करते रखवाल, केशव माधव..

5. यार सुदामा मा पास बुलाकै, दो मुट्ठी चावल की खाकै। सौंप दिये सारे धन माल, केशव माधव...

6. चन्द्रभान यह सन्त बतावै, रोग दोष संकट मिट जावैं। हरि भजन से होज्या निहाल, केशव माधव...

भजन-174

( तर्ज: - सादा )

टेक : कलियग में सनतों के संग से होज्या बड़ा पार । रोग दोष मिटजां सारे चल सन्ता के द्रबार। 

1. गाम शिरावड सन्त एक जो बैठे हरि भजन मे राधेश्याम की रटना ला दा जिसने बालेपन दसों इंद्री काबु कर नई जोत जगा ली तन में! अड्सठ तीर्थ का फल मिल ज्या पाप कटे दर्शन मे सत्संग की निर्मल गंगा यहाँ बहै पवित्र धार।

2. तरुवर सरवर सन्त जन और बादल मेंह बतलावेँ। परमारथ के कारण चारों देह धार कै आवं। बिघ्न कलेश मिटैं सारे जो शरण सन्त की जावैं। श्रद्धा और विश्वास करे तैं मन चाहा फल पावैँ। शनिवार पणवासी ने आ देख रहे नर -नार॥

3. ब्रह्मा, विष्णु, महेश देव और खुद कृष्ण भगवान। आठों पहर जोत जगती यहां रक्षक हैं हनुमान । परोपकारी त्यागी तपस्वी रहै हरि में ध्यान। काया में आनन्दी होज्या देख सन्त की श्यान। शुद्ध आत्मा हो ज्यागी सुन सनतों का प्रचार।।

4. करकै शुद्ध विचार चाल जो दर्श सन्त के करले। चन्द्रभान हो गात पवित्र मिटजां घाव शितरले। भूत प्रेत सब रोग खत्म हों सारी काढ़ कसर ले। शक्ति से मुक्ति दे के सब पीड़ पराई हर ले। सनतां के वश रहते यहां देख लियो करतार।।  

भजन-175

 ( तर्ज: - मेरे नटवर नन्द किशोर )

 टेक:- जीओ हजारों साल, सन्त की उमर बढ़ो ।

1. देने आ रहे आज बधाई, दिन दिन होज्या कला सवाई टेर सुने नन्द लाल, सन्त की...

2. न देख सन्तों की प्यारी, रोग दोष नर नारी हों निहाल, सन्त की...

3. सन्तों का है ढंग निराला, बिना दवा मिटै रोग हो रहा किसा कमाल, सन्त की...

4. सन्त राम का नाम जपाते, भगवन से हैं आप मिलाते। होते दीन दयाल, सन्त की....

5. जुग-जुग जीओ सन्त हमारे, बीत कल्प युग चार जां सारे। करते रहैं प्रतिपाल, सन्त की....

6. चन्द्रभान सनतों की माया, इनकी जै हो छत्र छाया। कट जाते जंजाल, सन्त की...  

भजन-176

( तर्ज:- सत्संग के मां चल कै बहना)

टेक:- पणवासी कातिक की आई, है संग में खुशियां ल्याई । हे सन्तों का जन्म बताया, चलो बहना देन बधाई ।।

1. पिछले कर्म हमारे बहना जो ऐसा सतगुरु मिलग्या। मन में जोत जगा दी ऐसी है पाप अंधेरा टलग्या। पूनम जैसा चन्दा खिलग्या, किसी फैल रही रोशनाई।

2. रल मिल सारी कट्ठि हो कै आज गीत खुशी के गाओ। सन्तों के दर पे जा बहना चरणों मै फुल चढाओ । घर-घर घी के दीप जलाओ, गुरु कर दे मौज सवाई।

3. सन्तों की जै बोलो बहना हे ऊंचे सुर तैं सारी। जुग-जुग जीओ सन्त महात्मा रहै श्यान दिखती प्यारी। गुरूओं की हो उमर हजारी, कहो टेर सुनैं रघुराई।।

4. चन्द्रभान सन्त का कहना हे कर सतगुरु की सेवा। भूली वस्तु लखाने वाले यह पार तार दें खेवा। मुंह मांगी मिल ज्यागी मेवा, फेर होज्या सफल कमाई।।

भजन-177

( तर्ज:- मैं सन्त नाम का मस्ताना )

टेकः:- यह कैसा रंग आज छाया है, कुछ फिरी हरि की माया है।

1. आज हुआ अनोखा काम यहां, है बनग्या बैकुण्ठ थाम यहां! विष्णु भूतल पर आया है, कुछ फिरी...

2. बही त्रिवेणी धारा प्यारी, श्रद्धा से शुद्ध हों नर नारी। जिसने भी गोता लाया है, कुछ फिरी...

3. ब्रज किसा बन रहा नक्शा, अब दीन दुखी की हो रक्षा। कृष्ण ने बीड़ा ठाया है, कुछ फिरी...

4. पणवासी कातिक की आईं, संग खुशियां रंग भरी ल्याईँ! सन्तों का जन्म बताया है, कुछ फिरी ....

5. कह चन्द्रभान चन्दा खिलज्या, है जोत जगी आनन्द यह देख के मन हर्षाया है, कुछ फिरी...

दोहा : सब जग ईश्वर रूप है, भला बुरा न कोय। जैसी जाकी भावना, तैसा ही फल होय।।

भजन-178

 ( तर्ज:- सादा )

टेंक:- सेवा को दोनों भले हों एक सन्त एक राम। राम मोक्ष के दाता हों सें सन्त जपावें नाम ।।

1. राम राम के कहने में जै तेरी जिहवा चल ज्यागी। आनन्दी हो मन मन्दिर में जोत निराली खिल ज्यागी। लाख चौरासी फेरी की ये सब विपता टल ज्यागी। जन्म मरण का झंझट छूट के फिर तनै मुक्ति मिल ज्यागी। राम कहें आराम मिलैगा सुबह नहीं तो शाम।।

2. साधु सन्त गृहस्थी सबका वहां खुल रहा खाता। अच्छा बुरा कर्म सभी है साफ लिखा पाता। कौडी कम ना दमड़ी ज्यादा देता वह दाता। जैसा कर्म करै बन्दा फल वैसा ही मिल जाता। ब्याज मिला सब मूल चुका दें गिन-गिन पूरे दाम॥

3. सन्त हरि के जामन होते नाम जपावैं ये। भगवन से मिलने का रस्ता साफ दिखानें ये। गुरु बिना गोबिन्द नहीं मिलता भेद बतावें ये । मोक्ष गति के दाता तक हैं आप पहुँचाने ये। बहतरणी से पार करण का इनके जिम्मे काम॥

4. राम से नाम बड़ा होता हो परम पदी देवा . चन्द्रभान सन्त कहते हैं पार लगे खेवा। हरि मिलन की इच्छा हो कर सन्तां की सेवा। ऋद्धि-सिद्धि धन मोक्ष गति सब मिल ज्यागी मेवा। हरि दर्श की प्यास बुझैगी चल सनतां के धाम ।।

भजन-179

( तर्ज:- राम कहें आराम मिलैगा )

 टेकः- राम सुमर सुख चैन मिलै है दुख में खास दवा बहना। सुबह शाम दो घड़ी टिका मन नीत भजन में ला बहना॥

1. हरि भजै सो हर का प्यारा, जात वर्ण कुल नहीं विचारा। भीड़ पड़ी में मिलै सहारा, हरि कीर्तन गा बहना।।

2. पांच ठगों ने नगरी घेरी, पूंजी लूट न खातिर तेरी। माया दुश्मन फिरै लुटेरी, इस तै गात बचा बहना।।

3. सोच करै बिन आई कल की, खबर नहीं है एक भी पल की। राम कहें हो विपता हल की, हरि कहें सुख पा बहना।।

4. चन्द्रभान सन्त की बाणी, ध्यान लगा सुन राम कहानी। बात नहीं यह खाली जानी, ले दिल ने समझा बहना।।

दोहा: - कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर। पीछे-पीछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर।।  

भजन-180

( तर्ज: - मोर मुकुट बंशी बाले )

 टेंक: संकट मिटज्या, फंदा कटज्या, हो ज्यागा कल्याण, रटले ओम हरि ।

1. राम कहें सुख धाम मिलै, मिट ज्यागी सारी व्याधि पांचों ठग ना धोंरे आवें, सत्संग करो घड़ी आधी। तुरिया पद में लगा समाधि, सही जमा ले ध्यान, रटले ओम हरि ।

2. क्या-क्या कहै के आया था, यहां आके कुछ किया नहीं । भजन कीर्तन सत्संग में, ध्यान कभी है दिया नहीं । नाम हरि का लिया नहीं, क्यूं गूंगी हुई जुबान रटले ओम हरि।

3. दसों इन्द्री कर काब में, हर में लाले नीत कती । भगतां के वश भगवन होते, इसमें कोन्या झूठ रती । मिल ज्यागी तने परम गति, खुद दर्शन दें भगवान रटले ओम हरि।

4. चन्द्रभान सन्तों का कहना, प्रीत हरि मैं जो लावै भीड़ पड़ी में सच्चा साथी, बौल सुनै भाग्या आवै किया कर्म फल मिल जावे, हो आगे का सामान रटले ओम हरि।