भजन-61

 ( तर्ज:- मिलता है सच्चा सुख केवल )

 टेक:- हम आकर शीश झुकाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे चरणों में। श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ॥

1. कुबेर जिसे भंडारी हो, तुम दीनों के हितकारी हो। हम याचक बनकर आतते हैं, गुरूदेव तुम्हारे चरणों में ॥

2. यश अपयश सब सहते हो, फिर भी मन में खुश रहते हो। यहां राम भजन मन भाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे चरणों में।।

3. हर कष्ट मिटाने वाले हो, और सुख पहुँचाने वाले हो। हम मन चाहा फल पाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ॥

4. सब होती पूरी आस यहां, है मिलता पर्चा खास यहां। सब रोग दोष मिट जाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ।।

5. कह चन्द्रभान सिद्ध काम सभी, यहां मिलते हैं आराम सभी। जब सन्त रसायन खाते हैं, गुरूदेव तुम्हारे चरणों में ।।

दोहा: सन्त सभा झांकी नहीं, कियो न हरि गुणगान। नारायण फिर कौन विधि, तू चाहता कल्याण।।  

भजन-62

 ( तर्ज:- सन्देशा सन्त फकीरों का )

टेक- सन्त मंत्र का मजा जिसकी जबां पर आ गया। मुक्त जीवन हो गया और चार पदार्थ पा गया।।

1. शबरी रटै थी नाम हर, रटने लगी थी ध्यान धर। सन्त बनकै राम घर, आ बेर झूठे खा गया।।

2. मीरांबाई थी सही, सनतों की शरणागत लईं। मनसा पूरी हो गई, जब श्याम मन को भा गया।।

3. किस्सा धन्ने जाट का, सौदा नहीं था घाट का। झटका सन्तों के ठाठ का, लिया देख आनन्द छा गया॥

4. प्रहलाद की ली ज्यान बचा, रैदास कै थी गंग बहा । कबीर की थी यज्ञ रचा, संसार यश गाता गया।।

5. नरसी भक्त परेशान था, पर कृष्ण जी पै ध्यान था। बन खाती पहुँचा आन था, सही मंजिल पै पहुँचा गया।।

6. चन्द्रभान सिद्ध काम है, जहां सन्त हैं वहां राम है । यह गुरुओं का पैगाम है, इतिहार्स भी दर्शा गया।।

दोहा: - श्री चन्द्रभान अवतार हैं, परम पुरुष भगवंत। कोटि कोटि मेरी वन्दना, है पूर्ण सतगुरु सन्त।।

दोहा:- हरि सम जग कुछ वस्तु नहिं, प्रेम पंथ सम पंथ । सदगुरु सम सज्जन नहीं, गीता सम नहीं ग्रंथ ।।

भजन-63

( तर्ज:- आए हैं शरण तुम्हारी )

 टेक:- टेर सुनो गिरधारी, प्रभु मेटो विपत हमारी ।

1. धनना जाट हरनन्दा नाई, पार तार दिये सदन कसाई । या जानै दुनिया सारी, प्रभु...

2. द्रोपदी की लाज बचाई, सहजो, शबरी, मीरांबाई। वा गनका पार उतारी, प्रभु...

3. नरसी के बनकै गडवाले, पांडवों के होके रखवाले। करगे खेल खिलारी, प्रभु...

4. रैदास भक्त के गंग बहा दी, कबीर भक्त की यज्ञ रचा दी। नहीं होन दी हारी, प्रभु...

5. दुर्योधन के मेवे त्यागे, साग विदुर घर आकर खागे। तुम मन मोहन बनवारी, प्रभु...

6. ध्रुव भक्त को मोक्ष दिलाया, खम्ब चीर प्रहलाद बचाया। देखे थे नर नारी, प्रभु...

7. बाल्मिक, महाबीर और बुद्ध, गज की ले ली तने आण सुथ है महिमा अपरम्पारी, प्रभु... 8. चन्द्रभान कह सन्त द्वारे, विघ्न क्लेश मेट दो म्हारे। हम आ रहे शरण तुम्हारी, प्रभु...

भजन-64

 ( तर्ज:- आज रल मिल कट्टी सारी )

 टेक: बहना होज्या बेड़ा पार, सतगुरु धोरे जा कै है।

1. अद्भुत है गुरुओं की माया, दुख दर्दा का करें सफाया। मन चाहा फल मिलज्या त्यार, सच्चा ध्यान लगा कै है।।

2. फंस रहीं हो चाहे ज्यान विष्न में, गुरु छुटा दे पिंड एक छन में। मन में करले सोच विचार, देख लिए अजमाकै हे।।

3. सारे दाग जिगर धोवै, रोग दोष ने जड़ तै खोवै। होवैं मन के दूर विकार, सन्त रसायन खाकै है।।

4. चन्द्रभान कह मान कही हे, फंदे के मां सहम फही है। हों से सही गुरु दातार, ज्ञान देवे समझाकै है।।

दोहा:- कथा कीर्तन कलि विषे, भवसागर की नाव। कह कबीर जग तरन को, नहिं और उपाय।।  

भजन-65

( तर्ज:- मैं क्लेल गेलां जांगी )

टैक:- हे सत्संग के मां चालो जड़ सन्तां का दरबार सै।

1. सत्संग तैं शुद्ध होती काया, फल मिल जाता मन का चाहा। है मल-मल के ने नहालो, उड़े बह रही गंगा थार सै ।।

2. सच्चा मार्ग सन्त दिखाते, ऊंच-नीच का भेद मिटाते। हे जा के फाय्दा ठालो, उड़े सत्‌ का हो प्रचार सै।।

3. कलियुग में ले सन्त का शरणा, जै चाहवै सै पार उतरना। हे मन में जोड़ लगा लो, करें सतगुरु बेड़ा पार सै।।

4. सन्त समागम मुश्किल थ्यावै, हरि कथा बड़ भागी गावै। हे सेवा खूब बजालो, तो फल मेवा का तैयार सै।।

5. मोह माया में सहम घिरी हे, रहज्या गठड़ी तेरी धरी है। हे हर तैं सुरती लालो, यो मतलब का संसार सै।।

6. कह चन्द्रभान लो सन्त सहारा, बहना हो ज्यागा निस्तारा। हे रस्ता साफ करालो, ये सतगुरु हों दातार सैं। हे सत्संग के मां चालो....

 दोहा:- भक्तन की महिमा अमित, पार ना पावे कोय। जहां भक्त जन पग धरै, असदरश तीरथ होय।।  

भजन-66

( तर्ज:- आना सुन्दर श्याम हमारे )

 टेक:- आज्या नन्द गोपाल, सन्त के सत्संग में। पूरा करो सवाल, सन्त के सत्संग में ।।

1. अखियाँ तेरे दर्श की प्यासी, देर करी क्यं ब्रज के बासी। दर्शन दो फिलहाल, सन्त के सत्संग मे।।

2. धेनु चैरय्या बैंशी बजैया मन मोहन तु कृष्‍ण कन्हैया। तन्नै कहै यशोदा लाल, संत के सत्संग मै।।

3. राधा की तनै करी मेर थी, कुब्जा की भी सुनी टेर थी। बनके दीन दयाल, सन्त के सत्संग में ।।

4. द्रोपदी की लाज बचाई, पार तार दी मीरां बाई । कर कै सच्चा ख्याल, सन्त के सत्संग में ।।

5. बलभद्र गऊवों का पाली, सुदामा की मेटी कंगाली । लुटा दिये धन माल, सन्त के सत्संग में ।।

6. चन्द्रभान कह सन्त द्वारे, तुम बिन नैया कौन उतारे। मेटो मन की झाल, सन्त के सत्संग में ।। पूरा करो सवाल...

दोहा:- तुलसी या संसार में, पांच रतन हैं सार। सन्त मिलन अरु हरि भजन, दया दान उपकार।।

भजन-67

( तर्ज:- चौकलिया )

टेक:- मैं मैं करकै मरे बहुत से मैं में विपता ठाई सै। तूही-तूही की रटना लाले या खास मोक्ष की राही सै।।

1. मैं कह कै हिरनाकुश मरग्या अपने हाथों नाश करा। ब्रह्मा पै वरदान मांग नहीं किसे का विश्वास करा। तूदी-तूही की रटन लानियां आ उसके घर में वास करा। प्रहलाद भक्त उसके बेटे ने सारा परदा फास करा । मारा नरसिंह अवतार धार कै सारी चौंध मिटाई सै ।।

2. मैं मैं करके रावण ने कहें कितना जुल्म कमाया जी । सब देवता दिये ठोक कैद में ऋषियों का खून कढ़ाया था, त्रिलोकी के दाता तै कर मैं में बैर लगाया था। एक लख गोती सवा लख नाती सारा कुटुम्ब खपाया था। विभीषण ने कह तूही -तूही सब करली मन की चाही से ॥

3. मैं मैं करके कौरव मरगे शब्द तूही का नहीं कहा। 60 हजार सगर के मैं में एक भी बाकी नहीं रहा। मैं मैं कर बकरे की ढालां भूल बीच में सहम गया। तूही-तूही की रटन लानियां लख चौरासी नहीं फहा। तूही-तूही हो राम भरोसे ईश्वर करें सहाई सै ।।

4. मैं का त्यागन कर दिल से तो हो ज्यागा कल्याण तेरा। अहंकार दे छोड़ कती तो साथी हो भगवान तेरा। दे तू ही तू ही की रटना ला हो सही ठिकाने ध्यान तेरा। कह चन्द्रभान आगे का रस्ता हो ज्यागा आसान तेरा। सनतां की शरणानत जा बस इसमें तेरी भलाई सै।।

दोहा: जनम मरन तें रहित है नारायन करतार। हरी भक्त के हेत सो, लेत मनुज अवतार।।

भजन-68

( तर्ज:- सादा चौकलिया क

टेक : संत समागम करा कहिन ना भजन राम का गाया। मुर्ख नर अज्ञानी बन वृथा जनम गवाया।।

1. पल में प्राण पखेरू हों या दो दिन की जिन्दगानी। फूला फूला फिरै सहम क्यूं जीव ओस का पानी। बादल कैसी छाया सै तेरी जोबन और जवानी ।। दो दिन की मेरा तेरी फिर होज्या खत्म कहानी । मोह माया के जाल में घिर कै हक ना हक दुख ठाया।।

2. लेना एक न देने दो क्यूं बाट भिड़ावै ठाली। अक्ल बिना उभाने ऊंट क्यूं सहम में पावै काली । बहुत यहां से चले गए जो थे दुनिया के बाली। मरा सिकन्दर देखा सबने दोनूं हाथ थे खाली । जोड़ जोड़ के कट्टी कर रह धरी धराई माया।।

3. भजन बन्दगी करे बिना तेरा होगा बेड़ा पार नहीं। मात पिता बन्धु सुत दारा साथ चलै परिवार नहीं । सतगुरु नैया पार लगा दें और कोए आधार नहीं । सन्त समागम करने तैं तेरी कदे भी होगी हार नहीं । रोग दोष मिटजां सारे जो सन्त शरण में आया।।

4. चन्द्रभान कह मान कहा तनैं बात कहूं समझा कै । मोशन गति मिल ज्यागी बन्दे हरि कीर्तन गाकै । सारे खोट माफ हो जांगे सन्त शरण में जाकै । आनंद हो निश्चित बैठज्या परमट सही कटा कै । दोघड़ी की सेवा से कोए लगता नहीं किराया ।।

दोहा:- दो बातन को भूलै मत, जै चाहवै कल्याण। नारायण इक मौत को, दूजे श्री भगवान।।

भजन-69

 ( तर्ज:- सादा चौकलिया )

टेक:- इष्ट देव अवतार धार सब सन्त मुनि और तपधारी। अपनी-अपनी माया हो सै शक्ति हो न्यारी-न्यारी।

1. विष्णु का अवतार राम दशरथ का राज दुलारा था। धनुष बाण की शक्ति तैं भूमि का भार उतारा था। ऋषि मुनियों की करके रक्षा असुर दलों को मारा था। मर्यादा पुरुषोत्तम आगे वह वेदाचारी हारा था। अपनी शक्ति दिखा प्रभु ने प्रजा सुखी करी सारी॥

2. द्वापर में कृष्ण के धोरे बंशी की शक्ति थी। सुनकै मोहित हो जाते जब तान सही लगती थी। श्रुव भक्त की दु. टिया के मां ज्ञान जोत जगती थी। प्रहलाद भक्त ने असुर झुकाए वह खुद अपनी भक्ति थी। नरसिंह आगै डटे नहीं वह हिरनाकुश बलकारी।।

3. नानक ने ऑंकार कह अपना प्रचार करा था। | महावीर और बुद्ध दोनों ने अहिंसा पे ध्यान धरा था। कबीर भक्त जुलाहे की शक्ति सारा काज सरा था रांपी तैं दिया गात चीर नहीं रैदास डरा था। शक्ति देख कै हार मानगे वो पण्डित वेदाचारी ।।

 4. चन्द्रभान सन्त की शक्ति डंडा तीन रंग का। ब्रह्मा विष्णु महेश बसै सैं लटका ले सत्संग का। एक मिनट में ठीक होवै चाहे हो रोगी चित भंग का। रोता आवै हँसता जावे होज्या काम उमंग का । इस डंडे तै रोग दोष मिटें कटजां सभी बीमारी ।।

दोहा:- तुलसी अपने राम को, हीज भजो चाहे खीज। भूमि पड़े उपजेंगे, उल्टे सीधे बीज ।।  

 भजन-70

 ( तर्ज:- सन्त का सत्संग कर )

 टेक:- करलो सोच विचार, जिंदगी थोड़ी सै।

1. दो दिन की सै मेला मेली, साथ चले ना महल हवेली । जाना हाथ पसार, जिंदगी थोड़ी सै।

2. यह जग एक मुसाफिर खाना, दो दिन डटके सबने जाना। चक्र में संसार, जिंदगी थोड़ी सै।

3. भूल में अपनी जिंदगी खोवै, सतगुरु दाग जिगर के धोवै। लो ने अगत सुधार, जिंदगी थोड़ी सै।

4. अपने मन का भ्रम मिटालो, जन्म-जन्म के फंद कटालो। सन्तों के दरबार, जिंदगी थोड़ी सै ।

5. कह चन्द्रभान लो नाम हरि का, बने खिबैया नाव तेरी का। होज्या बेड़ा पार, जिंदगी थोड़ी सै। करलो सोच विचार....