भजन-201

( तर्ज:- हरि का नाम लेने से)

टेक : नाम आधार बिन प्यारे चलेगा काम यूं कैसे। किराए की खड़ी नैया लंघाए कौन बिन पैसे।।

1. भूल में जिंदगी खोवै, विषयों की नींद में सोवै। जिसे भी बीज यहां बोवै, पड़ेंगे काटने वैसे।।

2. जबां पर नाम हो प्यारा, मिले संकट से छुटकारा। तेरा हो ज्यागा निस्तारा, बनाले ढंग कुछ ऐसे।।

3. नहीं कुछ छल कपट चलता, दीप जहां सत्य का जलता है लेखा वहा साफ मिलता, किये हो जहा कर्म जैसे॥

4. पांच का करदे तू त्यागन, रमाले राम में ही मन। तो खुद दर्शन दें आ भगवन, मस्त हो कै तेरी लय से ।।

5. यह चन्द्रभान बतला वें, शरण सन्तों की जो जावैं। गति ही मोक्ष की पावै, डरे ना काल के भय से।।  

भजन-202

( तर्ज:- हां ए जै राम भजन पै डटज्या )

 टेक:- हां ए ना भजन राम का गाया, बेकार करी क्यूं काया।

1. कुटुम्ब कबीला देख के फूली, ममता में फंस हरि ने भूली। हां ए ना राम नाम मन भाया, बेकार करी...

2. सदा पाप की करी कमाई, साथ चलै ना धेला पाई। हां ए रहै धरी धराई माया, बेकार करी...

3. भर रही कौली कह के मेरा, अन्त समय ना कुछ भी तेरा। हां ए बन पागल धोखा खाया, बेकार करी.....

4. सारी कड़ी टूट के बहना, करोड़ों बन्ध छूट के बहना। हां ए यह नर तन मुश्किल पाया, बेकार करी....

5. हरि नाम बिन हो ना शुद्धि, पांच ठगों ने फेरी बुद्धि। हां ए क्यूं वृथा जन्म गंवाया, बेकार करी....

6. चन्द्रभान सन्त की बाणी, उनकी होगी अमर कहानी। हा ए जिनने ध्यान हरि में लाया, बेकार करा...

भजन-203

( तर्ज:- हरि का नाम लेने )

 टेक:- अरे नादान करले ध्यान, तू मेहमान दिन दस का। अमर होज्या तेरी काया, ले पी प्याला हरि रस का।।

1. यह माया महल है ढहना, नहीं इस फंद में फहना। जै चाहवै चैन से रहना, छोड़ दे पांच का चसका।।

2. धर्म पर फेर कै रंदा, लिया क्यूं पाप का धन्धा। सदा चुगली करी निन्‍्दा, किया ना काम कुछ जस का ।।

3. मिलै सुख एक के मारे, हों दस के फैल बन्द सारे। जिन्हें समझे सही प्यारे, वो चूसैं खून हर नस का।॥।

4. हरि के गीत गाने से, भजन में नीत लाने से। शरण सतगुरु की जाने से, नहीं रहे मौत के बस का।।

5. रंगा मन सन्त के रंग से, मिलेगी मोक्ष इस ढंग से। कह चन्द्रभान सत्संग से, मिटैगा तीन का चसका।।  

भजन-204

 ( तर्ज:- सुबह शाम जिसको )

टेक:- हे नाथ जिस पर दया हो तुम्हारी । वही दीन बन्धु है तेरा पुजारी ।।

1. तेरे नाम के जो बने हैं दीवाने । है तूने दिखाई उन्हें श्यान प्यारी ॥

2. हो बैकुण्ठ सी ही जगह वह निराली। जहां जाती है तेरी महिमा उचारी।।

3. जिस पर नजर तेरी होती कहर की। है मिलती नहीं उसे वस्तु उधारी।।

4. यह दुनिया तेरी है, तू है जग का पाली। कि कण-कण में करते हो भगवन खिलारी।।

5. है ऊंचा भी दर्जा उसी ने है पाया। तेरे दर का भगवन बना जो भिखारी ।।

6. नहीं मौत का भी उसे कोई खटका। तेरी याद में भगवन जिसने जिंदगी गुजारी ॥

7. हमें भी लंघा दो तुम्हीं हो खिवैया। कृपा सिन्धु सुनना यही विनती हमारी ।।

8. ये गौत्तम बताते हैं सन्तों की बाणी। तू उनका है सेवक जो रटते मुरारी॥।  

भजन-205

(तर्ज:- हम आकर शीश झुकाते हैं)

 टेंक:- हैं देव तलक खुश हो जाते, गुरुदेव तुम्हारी पूजा से। हम पावन गंगा में नहाते, गुरुदेव तुम्हारी पूजा से

1. तुम दाता दीन दयालु हो; और हम सब पर कृपालु हो। हम मन चाहा फल है पाते, गुरु देव तुम्हारी पूजा से॥

2. तुम नाप जपाने वाले हो, हर दोष मिटाने वाले हो। नहीं संकट से हम घबराते, गुरुदेव तुम्हारी पूजा से ।।

3. हो भूली वस्तु लखावनियां, गोबिन्द से आप मिलावनियां। हम भजन कीर्तन ही गाते, गुरुदेव तुम्हारी पूजा से ।।

4. जो करते हैं तुमरी सेवा, उन्हें मिलती है अदभुत मेवा। ठग पांचों पीछा दिखलाते, गुरुदेव तुम्हारी पूजा से ।।

5. जो सेवक तेरा पुजारी हो, कह चन्द्रभान नहीं हारी हो। हम परम गति को हैं पाते, गुरुदेव तुम्हारी पूजा से ।।

 दोहा:- जो मन वचन क्रम से, रटते हैं श्री राम। करें कृपा उन पर सदा, भगतों के सुख धाम ।।  

भजन-206

( तर्ज:- सादा )

टेक : ओम हरि हर ओम हरि हर मुख से बोलो ओम हरि सुबह शाम दस पांच मिनट कहै हो मंजिल आसान तेरी ।।

1. ओम हरि का नाम लिए तैं विपता सारी टलती है। काया शुद्ध हो आनन्दी की जोत निराली खिलती है। शक जगह मन डट जाता नहीं पेश पांच की चलती है। लाख चौरासी फेरा छूट के गति मोक्ष की मिलती है। जिसने सच्चा ध्यान लगाया हर ने नैया पार करी॥

2. सहज सहज अभ्यास बनैगा मन के ढाला गेरे तैँ। हरि किर्तन सत्सन्ग में जा बैठ के माला फेरे तैं। बोल सुनै जब भाज्या आवै नाम हरि का टेरे तैं। दुगना चुगना निपजैगा इब थोड़ा बीज बखेरे तैं। सन्त मुनि समझाते हैं यह सुन वेदों की बात खरी।।

3. ठौड़ पड़ा पत्थर भारी जै एक जगह पर मन डटै। डंग धरले मंजिल कानी या सहज-सहज तेरी बाट कटै। इस सौदे में कोन्या घाटा बिल्कुल पूरा सही पटै। करी कमाई आगै आतवै पूंजी बिल्कुल नहीं घटै। नाम अनमोले धन तैं रहैगी थैली सदा भरी ।।

4. चन्द्रभान सन्त का कहना ध्यान हरि में लाओ। आध घड़ी की फुरसत लाके सत्संग के मां आओ। राम भजै सो उसका प्यारा बेशक तैं अजमाओ। सीधा जा बैकुण्ठ धाम ने दर्श हरि के पाओ। कोए नहीं रोकन आला जब मिलज्या धुर का पास फरी।।

दोहा:- दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णा वश धनवान। होय न सुख संसार में, सब जग देखी छान ।।

भजन-207

( तर्ज: - सावन )

वैक- सत्संग सुनने हे माँ मेरी मैं गई री, है री लगा सन्तां का दरबार ।

1. उड़े हाजिर शेष गणेश री, और ब्रह्मा विष्णु महेश री। है री सब देवन कक परिवार, सत्संग सुनने...

2. उड़े हर में लागै प्रीत री, हो सही कै नीत री न हे री सुन राम नाम प्रचार, सत्सग सुनने...

3. मिले सतगुरु दीन दयाल री, रहे काट विपत के जाल री। हे री हो दुखियों का उद्धार, सत्संग सुनने...

 4. रोग दोष वहां खू रहे री, मन के मैल सब धू रहे री। हे री सब होते दूर विकार, सत्संग सुनने...

5. न्यूं कहता चन्द्रभान री, यह सन्तों का फरमान री। हे री करो सत्संग बारम्बार, सत्संग सुनने...

दोहा:- सुख में प्यारे बहुत हैं, नहीं दुख में प्यारा कोय। कह नानक हरि भज मना, अन्त सहाई होय।।  

भजन-208

(तर्ज:- करो हरि का जाप )

टेक:- आओ कृष्ण मुरार, यो बेड़ा पार करो।

1. नरसी के गडवाले तुम हो, अर्जुन के रखवाले तुम हो। होन नहीं दी हार, यो बेड़ा पार...

2. कबीर भक्त की यज्ञ रचा दी, रविदास घर गंग बहा दी। ऐसे हों दातार, यो बेड़ा पार...

3. धन्ने जाट की लाज बचाई, नाम देव की करी सहाई। बनगे आप कहार, यो बेड़ा पार...

4. सैन भक्त का कष्ट मिटाया, मोरध्वज का धर्म बचाया। जानै सब संसार, यो नेड़ा पार...

5. सदन कसाईं पार उतारे, अजामेल के बनकै प्यारे। दिया नारायण आधार, यो बेड़ा पार...

6. मीरां, गनका, करमां तारी, कुब्जा, राधा, रुकमण प्यारी। पूरे करे करार, यो बड़ा पार...

7. चन्द्रभान सन्त बतलावें, भजन तेरे जो निशिदिन गावै। टलै विपत का भार, यो बेड़ा पार...

भजन-209

( तर्ज:- मनै राम भजन मन भावै हे सखी )

 टैक:- तेरा हो ज्यागा निस्तारा हे, हरि नाम से मगन रहै।

1. राम कहे आराम मिलैगा, सुबह नहीं तो शाम मिलैगा। रंग खिलैगा न्यारा हे, जोत निराली जगन रहै।

2. लाख चौरासी फंद कटैगा, जन्म-मरण का पिंड छुटैगा। तेरा कष्ट मिटैगा भारा हे, नहीं तीन ताप की अगन रहै।

3. जै नीत भजन में निशिदिन लागै, करी कमाई आज्या आगै। तेरा भय भागैगा सारा है, नहीं पांच उत की ठगन रहै।

4. जैसच्चा ध्यान जमावैगी तो, मीरां सा फल जग | तू पावैगी हर प्यारा है, न्यूं धजा फरकती गगन रहै

5. चन्द्रभान सन्त दुख टलज्या, राम नाम जै मुख में घलज्या। यो मिलज्या मोक्ष किनारा है, जै मन सच्ची लग्न रहै

दोहा: - सुमरिन ऐसा कीजिए, करंरै निशाने चोट। मन ईश्वर में लीन हो, हले न जिहवा होठ ।।

भजन-210

( तर्ज:- कोए आवै कोए जावै )

टेक:- है जीव बुलबुला जल का, यह पल भर में मिट जायेगा।

1. नहीं भरोसा इस जिंदगी का, सांस-सांस में हरि रमा। छोड़ के व्याधि लगा समाधि, ध्यान भजन में सही जमा। सब भूल भर्म का खलका, नहीं अन्त समय पछताएगा।

2. अब नर मन में चेत करले, काया कच्चा कोट है। जम तोड़ेंगे पल में इसने, कुछ ना इसकी ओट है। यह मेला है चल चल का, ले नाम हरि सुख पाएगा।

3. मनुष्य जन्म की मौज यह बन्दे, मिलती बारम्बार नहीं। नाम लिए बिन काम चले ना, टलै विपत का भार नहीं। तेरा होज्या बोझा हल्का, जै भजन कीर्तन गाएगा।

4. एक दिन पिंचर हो काया में, सारी फूंक लिकड़ ज्यागी। ठेस लगे ना पेश चले या, नाड़ी मन्दी पड़ ज्यागी । क्यूं घमंड करै से बल का, नहीं काम वक्त पर आएगा।

5. चन्द्रभान सन्त का केहना, ध्यान हरि का बन्दे धर। संतगुरु की जा पहुँच शरण में, भजन कीर्तन सत्संग कर। सब भरम मिटाले दिल का, तेरा सतगुरु फंद कटाएगा।